• आदिवासी सस्कृति में जन्म से मृत्यू तक उपयोगी है महुआ
  • देश में आदिवासी का कल्पवृक्ष भी कहा जाता है महुआ

धर्मेन्द्र पाण्डेय
मंडला,

मण्डला बेरोजगारी के लिये जाना जाता है. बेरोजगारी व मौसम की मार से मंडला से लगे वनांचल क्षेत्र के आदिवासी बैगाओं की आजीविका पर संकट के बादल छा गए हैं.

वनों के आसपास निवास करने वाले अधिकांश आदिवासी बैगा जाति के लोग वनों से प्राप्त जड़ी – बूटियों,कंद – मूल, फलों, औषधियों वन्य सामग्री जुटाकर अपना जीवन यापन करते हैं जिसमे प्रमुख महुआ है जिसको जंगलों से बीनकर वन्य समीपी निवासी अपने घर में लाते हैं और सुखाकर उसी तरह सुरक्षित और व्यवस्थित रखते हैं जैसे उधोगपति नोटों की गड्डी को तिजोरी में रखते हैं और इसी महुआ को आवश्यकता पडऩे पर बाजार में बैचकर दैनिक जरूरतों की वस्तुएं खरीदते हैं.

इसके महत्व का अनुमान तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुछ लोग इसी महुआ को बेचकर अपने बच्चों का विवाह भी कर लेते हैं.आदिवासी संस्कृति में जन्म से लेकर मृत्यु तक महुआ के उपयोग के कारण महुआ को प्रदेश के आदिवासियों का कल्पवृक्ष कहा जाता है, प्रत्येक सामाजिक कार्यों में ये महुआ के रस से बने पेय का पान करने के पूर्व जमीन पर पितरों के नाम से छिडक़ते हैं फिर स्वयं पान करते हैं.

किंतु फरवरी के अंतिम सप्ताह व मार्च में हुई बारिश और ओलावृष्टि के कारण महुआ की डालों में अंकुरण लगने के पूर्व ही नष्ट हो गया. ग्रामीणों का कहना है कि महुआ की कम फसल का एक कारण यह भी कि जब डालों में कलिया निकलने वालीं होती हैं उसी समय ओले व बारिश हो गई और मौसम ठंडा हो गया जिससे फूलों की कलियों को पर्याप्त गर्मी नहीं मिल पाई और ये विकसित न हो कर नष्ट हो गये.

ओलो व बारिस की मार के चलते इस वर्ष महुआ का उत्पादन कम है सग्रहण केंद्रों में 30 रूपये किलो खऱीदी की जा रही अभी सरकार की कोई नई योजना नही आई हैं .
-महेंद्र प्रताप सिंह, वन मण्डल अधिकारी, पश्चिम सामान्य वन मंडल मण्डला

वनांचलों में रहने वाले ग्रामीणों का जंगल में होने वाली ऊपज ही अर्थव्यवस्था का मुख्य स्त्रोत है किन्तु सरकार के पास इसको लेकर कोई योजना नहीं है.जबकि इस वर्ष प्राकृतिक आपदा से उत्पादन कम होने के चलते फसलों की तरह महुआ पर भी सरकार को चितन करना चाहिए.
-संजीव उईके
विधायक विधान सभा क्षेत्र मण्डला

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