संसद में प्रस्तुत वर्ष 2014-15 के आर्थिक सर्वेक्षण में यह तो कहा गया है कि देश की अर्थव्यवस्था में गत वर्ष सुधार (रिबाईवल) की स्थिति आयी लेकिन अर्थव्यवस्था की उन्नत (रीइमरजेन्स) अवस्था भी नहीं माना जा सकता है. उसका एक सबसे बड़ा कारण यही रहा है कि देश की औद्योगिक विकास दर नीचे की तरफ ही रही.

तमाम देशी और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की घोषणाओं के कार्यक्रमों के बाद भी जब तक देश की औद्योगिक विकास दर ऊपर नहीं आयेगी आर्थिक जगत में आर्थिक संपन्नता भी नहीं आ सकती.
भारत के नाम के साथ यह ‘ठप्पाÓ लगा हुआ है कि वह कृषि प्रधान देश है और औद्योगिक उन्नति व विकास दूसरे क्रम में है. कृषि उत्पादन में अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, जापान भी काफी उन्नत है और कृषि उत्पादन व कृषि अनुसंधान में भारत से काफी आगे हैं. लेकिन उन्हें ‘कृषि प्रधान या उद्योग प्रधानÓ के रूप में नहीं विकसित किया गया. वहां कृषि और उद्योग साथ-साथ बढ़े है और इन देशों में तो कृषि को भी उद्योग व विज्ञान से जोड़ दिया गया है और खेती व्यापार के लिये वहां ज्वाइन्ट स्टाक कंपनियां काम करती है.

भारत में लगभग 1500 तुर्की, अफगानी मुगलों व अंग्रेजों के शासनकाल में कृषि ही मूल्य धंधा बना रहा. केवल अंग्रेजों के शासन काल में कुछ औद्योगिक गतिविधियां शुरु हुईं. इस कारण अभी भारतीय अर्थ व्यवस्था समग्र रूप में संगठित नहीं हुई है. आधुनिक भारत में उस ओर प्रयास अवश्य हुए हैं.
सर्वे में यह कहा गया है कि देश में आर्थिक विकास दर (जेडीपी) 8.1 से 8.5 प्रतिशत होने जा रही है और यह 8.10 प्रतिशत तक जाने की राह पर है. महंगाई में 6 प्रतिशत की कमी आ गई है. राजकोषीय घाटा जो 6 प्रतिशत पर चल रहा है उसमें एक प्रतिशत की गिरावट आयी है और यह कम होना आगे भी जारी रहेगा. लक्ष्य यह है कि इसे 4.1 प्रतिशत तक लाया जाए तभी देश के सकल घरेलू उत्पाद में उसका सामंजस्य बन पायेगा.

देश में अप्रैल-सितम्बर की 6 माही से मूल्य और मुद्रास्फीति में कमी आनी शुरू हो गयी है. अभी विदेशी निवेश उस स्तर पर नहीं आया है कि उससे भारत के राजकोषीय घाटे को सहारा मिले. एफ.डी.आई. के दो मूल उद्देश्य हैं- एक तो देश में औद्योगिक ग्रोथ को बढ़ाना और उसके आने से राजकोषीय घाटा कम करना.
यह भी माना जाता है कि खाद्यान्न के मूल्यों में कमी या बढऩे से आम उपभोक्ता को अर्थव्यवस्था पर तेजी से व्यापक प्रभाव पड़ता है. लेकिन सब्जियों और फलों के मूल्यों के आधार पर अर्थव्यवस्था का आंकलन केवल आंकड़ों का सब्जजाल है. इनके मूल्य इनके रोज के आवक पर निर्भर होते हैं. आज जीवन औद्योगिक मूल्य से प्रभावित होता है जिनमें एक स्थायित्व होता है.

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