बेटी की विदाई जैसे टपकाए आँसू

नवभारत न्यूज खंडवा,

निमाड़ की संस्कृति से लबरेज गणगौर उत्सव अंतिम चरण में है। लोगों की श्रद्धा इतनी कि बस चले तो रथ लेकर जमीन पर चलने वालों को जमीं पर पांव तक न रखने दें। रणुबाई और धणियर राजा की विदाई में आस्थावानों की आँखों से आँसू टपक रहे थे,जैसे वे खुद की बेटी को असल में विदा कर रहे हों। अंतर्रात्मा में यह उत्सव निमाडिय़ों की रग-रग में बसा है। माथे पर रथ रखकर नंगे पांव गांवों से रथों को शहर घुमाने भी लोग ले आए।

अतिथि आवभगत के बाद दूसरे दिन जवारों का विधिपूर्ण ढंग से विसर्जन कर अंतिम विदाई दी गई। शहर के अलावा पूरे निमाड़ में आस्था के चलते वातावरण गणगौरमयी हो गया। गुलाल की बौछार व मदमस्त बैंड पर माता के गीतों की सुमधुर धुनें दर्शनार्थियों को सहसा ही अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। आस्था भरे माहौल में जवारों का पूजन कर गणगौर घाट पर विसर्जन किया गया। म्हारी रणुबाई सासर जाए,जैसे गीत गाती महिलाओं ने नौ दिनों बाद जवारों का विसर्जन किया।

बुधवार शाम को शहर के सभी रथों को गांधी भवन लाया गया। जहां उन्हें एकत्रित कर कतारबद्ध रूप से मातारूपी जवारे रख उनका पूजन कर रथों को सिर पर रखते हुए गणगौर घाट व अन्य विसर्जन स्थलों पर विसर्जन किया गया। जवारों को गले लगाकर दोनों हाथों से नदियों में विसर्जित किया गया। विसर्जन के पूर्व जिन लोगों ने माता के रथ मन्नत लेकर बौड़ाए।

गाजे-बाजे से अगुआई

शहर की मुख्य बाडिय़ों से जुड़े सभी रथ एकत्रित होकर गाजे-बाजे के साथ नाचते गाते हुए गांधी भवन पहुंचे। जहां पर मन्नत व बिना मन्नत वाले रथों को एक साथ पूजा गया। आदरभाव पूर्वक पूजने के बाद रथों को लेकर चलने वालों के पैरों के नीचे चादर व टाट पट्टी रखी गई ताकि उनके पैर जमीन को न छू सके। गांधी भवन से चल समारोह के रूप में निकले रथ जब तक घर तक वापस नहीं पहुंच जाते तब तक यह प्रक्रिया जारी रहती है।

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