हर जगह करना पड़ता है घंटों इंतजार

नवभारत न्यूज भोपाल,

मध्यप्रदेश का पहला और इकलौता अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) राजधानी में प्रदेशभर की जनता को बेहतर स्वास्थ्य सेवा और जटिल रोगों का इलाज मिल सके, इसको ध्यान में रखकर खोला गया था. पर एम्स के खुलने के कई वर्षों के बाद भी आज तक ेलोगों को इलाज के लिये बहुत परेशान होना पड़ रहा है.

इलाज के लिये लोग सुबह 4 बजे से ही टोकन के लिये लाइन में लगे नजर आते हैं. घंटों लाइन में लगने के बाद टोकन मिल पाता है. इसके बाद डॉक्टर से परामर्श के लिये फिर से इंतजार करना पड़ता है. परामर्श के बाद जांचों के लिये फिर से घंटों का इंतजार इस तरह से कई घंटों में इलाज मिल पाता है.

जबकि एम्स प्रबंधन की तरफ से बार-बार यही कहा जाता रहा है कि एम्स निरंतर विकास की प्रक्रिया पर आगे बढ़ रहा है और एम्स में हुये निर्माण कार्य, विभिन्न रोगों की जांच हेतु स्थापित की गईं मशीनें इत्यादि के विषय में प्रचार-प्रसार किया जाता है और मरीजों को इलाज के लिये जिस जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, इस पर पूछने पर जवाब मिलता है कि प्रबंधन प्रयासरत्ï है, प्रक्रिया को सरल करने के लिये.

यहां पर सवाल उठता है कि किसी भी मरीज को सबसे पहले इलाज के लिये क्या चाहिये. जवाब एक ऐसी सरल प्रक्रिया होनी चाहिये जिससे मरीज को समय पर इलाज मिल सके और वह जल्द स्वस्थ हो. यही किसी भी अस्पताल का आधार होता है. क्योंकि मरीज का इलाज ही अस्पताल का मुख्य कार्य होता है. पर एम्स में इसके अलावा और बहुत से कार्य अच्छी तरह से हो रहे हैं.

एम्स में मरीजों के लिये वार्डों में बिस्तर की संख्या काफी कम है. सर्जीकल वार्ड में मात्र 6 बेड हैं, 6 से ज्यादा मरीज होने पर मरीजों को भर्ती करने के लिये वेङ्क्षटग का प्रावधान है, जहां भर्ती मरीज के डिस्चार्ज होने पर दूसरे मरीज को भर्ती किया जाता है.

एम्स में विभागों में सामंजस्य की कमी के चलते मरीज एवं उसके परिजनों को बार-बार चक्कर लगाने पड़ते हैं. छोटी से छोटी चीज के लिे घंटों का इंतजार करना पड़ता है. एम्स के इलाज की इस जटिल प्रक्रिया के चलते मरीज की हालत ठीक होने के बजाय और बिगड़ जाती है.

हमारे पास स्टाफ की कमी है एवं बहुत से कार्य एम्स के विकास के लिये किये जा रहे हैं. जहां तक इलाज की बात है, बड़ा अस्पताल है ओपीडी में कभी-कभी संख्या दो हजार तक भी पहुंच जाती है इसलिये मरीजों को इलाज के लिये इंतजार करना पड़ता है. फिर भी हम प्रयासरत् हैं प्रक्रिया को सरल बनाने के लिये, जिससे मरीजों को कम समय में उचित इलाज मिल सके.
डॉ. नितिन एम. नागरकर
डायरेक्टर, एम्स भोपाल

मेरी उम्र 72 वर्ष है. एम्स में मैं हार्निया के इलाज के लिये 13 मार्च को आया था, जहां पर मुझे 28 मार्च को ऑपरेशन की तारीख दी गई थी और 27 मार्च को भर्ती होने को कहा गया था. जब तय तारीख पर मैं एम्स पहुंचा तब कोई भी बेड खाली नहीं था. कुछ समय बाद ही एक पेशेंट डिस्चार्ज हुआ था और उसी की जगह मुझे भर्ती होना था.

पेशेंट डिस्चार्ज होने से मेरे भर्ती होने की प्रक्रिया में 3 घंटे के लगभग समय लग गया और मुझे अभी तक भर्ती नहीं किया गया. यह सब देखते हुये मैं वापस अपने घर को रवाना हो गया क्योंकि मैं एक बूढ़ा व्यक्ति हूं और इतने बड़े अस्पताल में छोटी-छोटी बात के लिये इधर से उधर चक्कर नहीं लगा सकता और मेरा स्वास्थ्य भी ठीक नहीं है.
एल.एन. शर्मा, निवासी विदिशा (म.प्र.)

Related Posts: