वर्तमान में चल रहे बैंक घोटालों की श्रृंखला में एक और चौथा 390 करोड़ का इस बार ओरियन्टल बैंक ऑफ कामर्स में समाने आया है. इस समय बड़े घोटालों में विजय माल्या- किंग फिशर एयरलाइन, नीरव मोदी- मोहुल चौकसी- ज्वेलर्स, कानपुर का कोठारी परिवार- रोटोमेक पेेन व पानपराग का मालिक चल ही रहे हैं कि इसी समय दिल्ली के ज्वेलर्स द्वारका दास सेठ इंटरनेशनल द्वारा ओबीसी बैंक का घोटाला सामने आ गया.

लेकिन यह घोटाला अन्य तीन घोटालों से इसलिये भी ज्यादा बढ़ा भ्रष्टाचार का मामला माना जायेगा क्योंकि इस घोटाले को दबाने में सी.बी.आई. का हाथ भी उजागर हुआ है. इस पार्टी के खिलाफ बैंक ने सी.बी.आई. ने 16 अगस्त 2017 में घपले की शिकायत दर्ज करायी थी और सी.बी.आई. उसे पिछले 7 महीनों से दबाये बैठी है.

सी.बी.आई. पर इसी तरह का इल्जाम हाल ही कुछ समय पूर्व बिहार के ‘सृजन’ कांड में भी लगा है. सजृन महिला विकास समिति की एक संस्था है जो साडिय़ों का निर्यात का व्यापार करती है. इस सोसायटी के बारे में कहा जा रहा है कि सिर्फ नाम की साड़ी निर्यात संस्था है.

इसके नाम से बैंकों से लाखों करोड़ों का कर्जा लेकर नेता आपस में बांटते चले आये है. यह क्या मामला उजागर होने पर उसे सी.बी.आई. को सौंपा गया और उसने अभी तक उस पर कोई कार्यवाही नहीं की है.दिल्ली का ज्वेलर्स दामोदर सेठ भी भाग चुका है. सी.बी.आई. उसे काफी पहले ही गिरफ्तार कर सकती थी या वह इस वक्त जमानत पर होता.

यह चार बड़े घपले इसलिए बड़े हैं कि भारी रकम और नामी गिरामी व्यापारी- उद्योगपतियों के काम आ रहे हैं. लेकिन वास्तविकता यह है कि बैंक के छोटे स्तर- कुछ लाखों-करोड़ों रुपयों के हजारों लाखों ऐसे मामले भारी मात्रा में इकट्ठा हो गये कि लोगों ने छोटी जरुरतों पर बैंकों से कर्जा तो लिया लेकिन चुकाया नहीं है.इनका पूरा- योग- टोटल भी बैंकों का इतना बड़ा घोटाला (एन.पी.ए.) हो गया है कि बैंकों के पास धंधा चलाते रहने के लिये पूंजी ही नहीं बची. इसके लिए केंद्र सरकार को इन बैंकों में पूंजी देना पड़ रही है.

अब तक अरबों रुपयों की सरकारी फंडिंग इस बैंकों की हो चुकी है. बैंकों से जो भी कर्जा दिया जाता है उसकी जायदाद या कि वित्तीय समर्थ व्यक्ति की जमानत पर दिया जाता है. यह गारंटी होती है इसलिए कि यदि कर्जा नहीं लौटाया तो उस जायदाद या गारंटर से वसूला जायेगा. लेकिन अनेकों मामले में गारंटी भी फर्जी निकली. गारंटी का वेरीफिकेशन करना और उससे संतुष्ट होना बैंक के अधिकारियों का काम है. सवाल यह है कि इतनी ज्यादा रकम हजारों लाखों के मामले फंसी पड़ी है. बैंक ने गारंटी के विरुद्ध उसकी वसूली क्यों नहीं की.

इन सभी कर्जों में यह बात भी सामने आ रही है कि इन कर्जों में ये बैंक के अधिकारियों ने 50-60 प्रतिशत तक रुपया खुद ले लिया है. अब पूरा बकाया कर्ज लेने वाल के नाम निकाल रहे हैं. जो उसे देना ही नहीं है. नीरव मोदी से लेकर छोटे कर्जदारों तक बैंक ने उन्हें यह भरोसा दिलाया है कि मामला दबा पड़ा रहेगा और उन्हें कुछ भी वापस नहीं करना है. अब तक उन मामलों को दबाने में सी.बी.आई. का भी नाम आने लगा है. क्या वहां भी मामला दबाने के लिये काफी कुछ लिया-दिया जा रहा है?

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