विश्लेषण
क्रांति चतुर्वेदी

नीति आयोग ने पूरे देश में 101 पिछड़े जिलों की सूची जारी की है. इसमें मध्यप्रदेश के 8 जिलों को शामिल किया गया है. नीति आयोग के जिलों को पिछड़ा घोषित करने के व्यापक पैरामीटर्स अभी स्पष्ट नहीं है.

लेकिन यह सवाल उठना लाजिमी है कि 8 के अलावा भी मध्यप्रदेश के अनेक जिले ऐसे हैं जिन्हें विविध आयामों में पिछड़ा माना जा सकता है और यदि कहीं विकास फंड की सुगबुगाहट हो रही हो या फिर विकास का विशेष रोडमैप तैयार किया जा रहा हो तो इन जिलों को भी पंक्ति में खड़ा किया जा सकता है.

कुल 101 में से यदि मध्यप्रदेश के 8 जिले ही शामिल किए गए हैं तो सरकार के पैरोकार यह दर्शाने की कोशिश कर रहे हैं कि यह संख्या राष्ट्रीय आंकड़े के संदर्भ में बहुत कम हैं. इस समूचे परिदृश्य का विश्लेषण करें तो हकीकत के हालात कुछ और बयां कर रहे हैं. मध्यप्रदेश के जिन 8 पिछड़े जिलों के नाम सामने आए हैं उनमें विदिशा, खंडवा, राजगढ़, छतरपुर, दमोह, गुना, बड़वानी और सिंगरौली शामिल हैं. यहां एक उदाहरण देना प्रासंगिक रहेगा.

पिछले माहों में मध्यान्ह भोजन की समीक्षा के लिए एक रिव्यू मिशन गठित किया गया. अध्ययन जिलों के चयन की बात सामने आई. एक जिला केंद्र सरकार को चयन करना था और एक जिला राज्य सरकार को. केंद्र सरकार ने तो तमाम गुण-दोषों के आधार पर श्योपुर जिले का चयन किया और राज्य सरकार ने ताबड़तोड़ विदिशा जिले का चयन कर लिया. दबी जुबान विदिशा के चयन के लिए जो दलीलें सामने आई वह जिला चयन प्रक्रिया में न्याय सिद्धांतों के विपरीत थी.

अभी पिछड़े जिलों में सबसे पहले विदिशा जिले का फिर नाम सामने आ गया है. कहा जा रहा है कि अटल बिहारी वाजपेयी, सुषमा स्वराज और शिवराज सिंह चौहान का निर्वाचन क्षेत्र रहने वाला यह जिला तब से अब तक कैसे पिछड़ा है? और वह भी क्या श्योपुर से ज्यादा पिछड़ा है? इस सूची में श्योपुर जैसे अनेक जिलों के नाम नहीं है.

इसमें टीकमगढ़, पन्ना से लेकर धार, झाबुआ और अलीराजपुर तक कई नाम गिनाए जा सकते हैं. आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा और कुपोषण एक बड़ा मुद्दा है. रोजगार के लिए गांव के गांव अभी भी पलायन को मजबूर हैं. फिर इन जैसे जिलों के नाम क्यों नहीं?

तब पुन: यह सवाल दोहराया जा सकता है जिसमें यह पूछा जाए कि वो कौन से मानक है, कौन सी प्रक्रिया है? जिनके आधार पर इस तरह का चयन हो रहा है. जिलों के चयन में समग्र दृष्टिकोण रखना होगा और मानकों का आधार भी व्यापकता लिए होना चाहिए.

इसमें मीडिया रिपोर्ट को भी शामिल किया जाना चाहिए. स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास के साथ-साथ कृषि और समग्र रोजगार विकास, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, समतावादी समाज की स्थापना से लगाकर तमाम सामाजिक और आर्थिक धरातल पर रेटिंग की जानी चाहिए और यदि लाभ और नई विकास योजनाओं की गुंजाइश हो तो प्रदेश के अन्य पिछड़े जिलों को भी सामने लाना चाहिए.

उल्लेखनीय है कि इन 8 जिलों के कलेक्टरों से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मध्यप्रदेश के मण्डला में 24 अप्रैल को विस्तृत बातचीत करने वाले हैं.

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