कर्नाटक के चुनाव नतीजे सामने हैं. जैसा कि पूर्वानुमानों में कहा जा रहा था कि किसी भी पार्टी को एकतरफा बहुमत नहीं मिलेगा, उसी अनुसार- भाजपा सरकार बनाने के जादुई आंकड़े के निकट तक तो पहुंच रर्ही है लेकिन फिलहाल स्पर्श करती नहीं दिख रही है.

कांग्रेस दूसरे नम्बर पर और जेडीएस तीसरे पर मैदान में है. यह जगजाहिर है कि कर्नाटक चुनाव में भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी. केन्द्रीय मंत्रियों से लगाकर तो मुख्यमंत्रियों की फौज को चुनाव मैदान में उतार दिया था. नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने भी अपने आक्रामक केंपेन और रणनीति के साथ कर्नाटक को जीतने की पूरी कोशिश की.

उन्हें इसमें काफी हद तक सफलता भी मिली लेकिन बिना गठबंधन किए भाजपा इतनी कोशिशों के बाद भी जादुई आंकड़े को पार नहीं कर पायी- यह समग्र तौर पर सोचने का विषय है.

खुद भाजपा को भी और भाजपा के सामने खड़े विपक्षियों को भी जो कर्नाटक को आगामी चुनाव के संदर्भ में अनेक दृष्टिïकोणों के साथ जोडक़र राजनैतिक चिंतन कर रहे थे. कर्नाटक चुनाव कांग्रेस को भी गहरे और प्रभावी आत्ममंथन का संदेश दे रहा है कि राहुल गांधी द्वारा तूफानी प्रचार और रैलियों करने के बावजूद चूक कहां होती गई?

बहरहाल, उनका कर्नाटक में नया घमासान सामने है. येदियुरप्पा ने अपनी दिल्ली यात्रा स्थगित कर दी है और राज्य स्तर पर जोड़-तोड़ में जुट गए हैं. अमित शाह ने तीन केंद्रीय मंत्रियों प्रधान, नड्डा और जावड़ेकर को दिल्ली से तुरत-फुरत कर्नाटक भेज दिया है ताकि वे राजनीति को अपने अनुसार मोड़ सके.

कांग्रेस ने जेडीएस को मुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव दे दिया है. दोनों दल राज्यपाल से मिलने का प्रयास कर रहे हैं. अब देखना है, राज्यपाल किस तरह फैसला लेते हैं और किन मापदंडों के आधार पर किस दल को सरकार बनाने के लिये बुलाते हैं.

कर्नाटक की लड़ाई का संदेश तो भाजपा के पक्ष में है लेकिन दूसरा संदेश यह भी है कि भाजपा के अकेले अपने दम पर सरकार बनाने के विजयरथ को यहां रोका भी गया है. अगले आम चुनाव के संदर्भ में कर्नाटक के नतीजे व्यापक विश्लेषण छुपाए हुए हैं.

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