भारत के चुनाव आयोग ने 27 मार्च को 224 सदस्यीय कर्नाटक एक विधानसभा के आम चुनावों की घोषणा कर दी और वहां 12 मई को मतदान होगा. यह वह राज्य है जहां 2008 में पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा चुनाव में विजय प्राप्त कर दक्षिण भारत मेंं पार्टी की पहली विजय और सरकार बनी थी. लेकिन उसके मुख्यमंत्री श्री यदुरप्पा पर उनके पहले ही शासन काल में भ्रष्टाचार के इतने स्पष्ट आरोप लगे कि अन्ततोगत्वा पार्टी को यह तय करना पड़ा कि उन्हें पद से हटा दिया जाए.

लेकिन भाजपा पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व उस समय भौचक्का यह गया जब श्री यदुरप्पा ने पार्टी के निर्णय के विरुद्ध तन कर आक्रोषित और बगावती मुद्रा में खड़े होकर पार्टी को ही चुनौती दे डाली कि वह उन्हें हटाकर बताये.

उन्होंने दावा किया वे राज्य की सबसे दमदार जाति लिंगायत है और वे अपने खुद की दम के नेता हैं. उन्हें पार्टी ने नहीं बल्कि उन्होंने दक्षिण भारत में पहली बार पार्टी को जमाया है. लेकिन खींचातानी के चलते श्री यदुरप्पा ने कुछ वर्षों बाद मुख्यमंत्री पर छोड़ दिया. लेकिन इससे वहां भारतीय जनता पार्टी का ऐसा पतन हुआ कि उसके बाद 2013 के चुनाव में वह हार गयी और सत्ता उसके हाथों से निकल गयी.

2008 में भाजपा के 110 सदस्य थे जो 2013 में घटकर 40 रह गये और कांग्रेस जिसके 2008 में 28 सदस्य थे वे 2013 में बढक़र 123 हो गये और वह तब से अब तक सत्ता में है. इस समय से कांग्रेस के श्री सिद्धारमैया मुख्यमंत्री हैं.

अब 2018 के इस चुनाव में भाजपा पुन: सत्ता में आना चाहती है और कांग्रेस वहां अपनी सत्ता को कायम रखना चाहती है. वहां की राजनीति लिंगायत समुदाय उतना ही निर्णायक और शक्तिशाली है जितना केरल की राजनीति को वहां की सबसे शक्तिशाली जाति नायर तय करते हैं.

इस समय भी चुनाव प्रचार में कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी दोनों ही लिंगायत को अपना मुख्य मुद्दा बना रहे हैं. कांग्रेस ने यह घोषणा ही कर दी कि यदि वे जीते तो लिंगायत को पृथक जाति सम्प्रदाय का दर्जा दे दिया जायेगा.

दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष श्री अमित शाह ने अभी से यह घोषणा कर दी कि यदि भाजपा जीती तो भूतपूर्व मुख्यमंत्री लिंगायत नेता श्री यदुरुप्पा ही मुख्यमंत्री बनेंगे. लिंगायत समुदाय की यह लंबे अरसे से मांग है कि उन्हें पृथक सम्प्रदाय की मान्यता दी जाए. जब से भारत सरकार ने जैन धर्म को हिंदुओं से पृथक सम्प्रदाय की मान्यता दी है तब से लिंगायत की मांग जोर पकड़ रही है.

कर्नाटक में लिंगायत समुदाय की आबादी 18 प्रतिशत है. 12वीं सदी में समाज सुधारक बासवन्ना ने हिन्दुओं में जाति व्यवस्था में दमन के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था और वेदों को मानने से इंकार कर दिया. वे मूर्ति पूजा के भी खिलाफ हैं. इस समय यह सम्प्रदाय राज्य में सम्पन्न और बड़ी जाति का माना जाता है.

कर्नाटक कांग्रेस के लिए भी काफी समर्पित राज्य है. जब 1977 में कांग्रेस अपने सबसे कठिन संकट काल में चल रही थी. उस समय उप चुनाव में श्रीमती गांधी ने कर्नाटक की चिकमंगलूर सीट से 1978 में लोकसभा उपचुनाव जीता था. भारतीय जनता पार्टी ने उनके विरुद्ध श्रीमती सुषमा स्वराज को खड़ा किया था और वे हार गयी थीं.

कर्नाटक की राजनीति में जनता दल सेक्युलर के नेता भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री देवेगोड़ा भी तीसरा खेमा बने हुए हैं. उनके भी भारतीय जनता पार्टी के बराबर 40 विधायक वर्तमान विधासनभा में है. जिनमें से हाल में ही में 7 इनसे टूटकर कांग्रेस में शामिल हो गए है. इस चुनाव में वास्तव में कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी में प्रतिष्ठा की जीत व हार का प्रश्न है.

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