क्रांति चतुर्वेदी

कर्नाटक चुनाव परिणामों का व्यापक असर मध्यप्रदेश में आगामी 6 माह बाद होने जा रहे विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया में देखा जा सकता है. मध्यप्रदेश के दोनों प्रमुख राजनैतिक दल भाजपा और कांग्रेस वहां के चुनाव से अनेक सबक ले सकते हैं.

कर्नाटक चुनाव का सबसे बड़ा सबक मध्यप्रदेश में कांग्रेस की राजनीति के लिये यही है कि उसे चुनाव पूर्व ही समाजवादी पार्टी, बसपा, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी व अन्य से गठबंधन कर लेना चाहिये. ऐसा कहा जा रहा है कि चुनाव पूर्व ही यदि कांग्रेस-जेडीएस के साथ कर्नाटक में गठबंधन कर लेती तो भाजपा की भी वही स्थिति होती जो गोरखपुर और फूलपुर में बीएसपी और एसपी गठबंधन के बाद हुई थी.

एक प्रमुख सबक कर्नाटक में भाजपा शैली का है जो निखर रही है. वह है-एक स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह का आक्रामक केंपेन और दूसरे स्तर पर संघ और भाजपा कार्यकर्ता का मौन बूथ प्रबंधन.

पहले स्तर में तो कांग्रेस राहुल गांधी के तूफानी दौरों और रैलियों से बराबरी करने की कोशिश करती है लेकिन दूसरे स्तर पर बूथ प्रबंधन में कांग्रेस को मध्यप्रदेश में अभी बड़ी तैयारी करना शेष है. कांग्रेस की रैलियों में दिखने वाला जनसमर्थन, वोट प्रबंधन में नहीं बदल जाता है-इसका मजबूत क्रियान्वयन एमपी में करना होगा.

कर्नाटक में चुनाव परिणामों से राज्य के अलग-अलग हिस्सों से एक रिपोर्ट यह भी आई की जहां-जहां सिद्धारमैया और मल्लिकार्जुन खडग़े के समर्थकों में ज्यादा गुटबाजी थी, वहां-वहां कांग्रेस को ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है.

इसलिये मध्यप्रदेश में दोनों दलों खासकर कांग्रेस को अपनी गुटबाजी पर अभी से प्रभावी नियंत्रण करना होगा. भाजपा और कांग्रेस दोनों को बागियों और प्रभावी निर्दलियों के समीकरण को भी अपनी जीत की राजनीति के अनुसार देखना होगा.

गौर करने लायक एक बिन्दु यह भी है कि कोई भी बड़ी लहर का कर्नाटक में ज्यादा असर नहीं था, अन्यथा भाजपा जादुई आंकड़े को आसानी से पार कर सकती थी. मध्यप्रदेश में भी यदि कोई बाहरी बड़ी लहर नहीं चली तब ऐसी स्थिति में स्थानीय मुद्दे और एंटीइन्केम्बेंसी के अनुसार दोनों दलों को अपनी-अपनी रणनीति के अनुसार तैयारी करनी पड़ेगी. कर्नाटक में कई मंत्री और विधायक भी चुनाव हार गये हैं. मध्यप्रदेश में भी इन स्थितियों से सतर्क रहना होगा. मध्यप्रदेश में कांग्रेस को इस बात के प्रयास करने होंगे कि कर्नाटक में दूसरे नंबर पर आने के बाद भी उसके कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा रहे. कांग्रेस को अपनी पुरानी शैली त्याग कर नये जमाने की राजनीति को और रणनीति को अपनाना होगा. चुनाव को किसी जंग की तरह लडऩा होगा.

Related Posts: