आम तौर पर सभी कानून व्यवस्था बनाने, संरक्षण करने, हितों की रक्षा करने आदि के उच्च आदर्श व उपलब्धि पाने के लिये होते हैं. इन्हीं की वजह से समाज में व्यवस्था और सुशासन चलता बनता है.

कानून-की परिभाषा या व्याख्याओं में यह माना गया है कि मानव सभ्यता का सबसे बड़ा विकास कानून की व्यवस्था बनाना है और मानव जाति का संपूर्ण विकास इसी से संभव हो सका है.

अराजकता उसी स्थिति को कहते है जहां कानून की मर्यादा व प्रभाव समाप्त हो जाता है, समाज में हिंसा-विघटन होने लगते है. शासन का यह अनिवार्य दायित्व व कर्तव्य है कि वह कानून व व्यवस्था (ला एंड आर्डर) बनाये रखे. परिस्थितियों के अनुसार कानून भी कई रूप के होते हैं जो समाज में दंडात्मक, सुरक्षात्मक सुधार व विकास के होते हैं और उन स्थितियों में परिवर्तन लाते हैं जो समाज हित में नहीं रहीं.

देश में आजादी के समय ऐसी कई सामाजिक व्यवस्थायें थीं जिनमें अनुसूचित जातियों, जनजातियों व आदिवासियों का शोषण होता चला आ रहा था. उनमें से अति अमानवीय छुआछूत (अछूत) व्यवस्था थी जिसे कानून से खत्म किया.

उनकी जातियों के नाम उन्हें गाली देने, अपमानित करने के लिये प्रयोग होते थे उसे दंडनीय अपराध बनाया गया. मूल रूप से आरक्षण की व्यवस्था संविधान में इन्हीं वर्गों के लिये थी जो सामाजिक व्यवस्था में सबसे पीछे हो गये थे और वहां कभी शिक्षा प्रणाली पहुंची नहीं थी.

इसी तरह समाज में शादी में लडक़ी को दहेज देने की मान्य व्यवस्था चलती आ रही थी. उस समय यह माना जाता था कि लडक़ी विवाह के बाद दूसरी जगह चली जाती है और यदि मायके से उसे जायदाद में हक दिया जाए तो वह दूर से उसकी व्यवस्था नहीं कर सकती.

पहले आवागमन के साधन ही बहुत सीमित व गतिहीन होते थे. बैलगाड़ी और घोड़े का जमाना था, इसलिये जायदाद में लडक़ी का हिस्सा उसे मां-बाप दहेज में दे देते थे. यह कानून में स्त्री धन माना गया है जिस पर उसका हमेशा हक बना रहता है. लेकिन यह कुरीति इसलिये हो गयी कि इसे वर पक्ष अपने लिये मांगने लगा कि शादी में दहेज में क्या दोगे जबकि वह वर पक्ष का होता ही नहीं है.

समाज में यह रीति ऐसी कुरीति हो गई इसके कारण आपसी संबंध, पति-पत्नी का सद्भाव तो बिगड़ा ही साथ ही लडक़ी की शादी में उसके मां-बाप आर्थिक रूप से ध्वस्त व कर्जदार हो जाते हैं. लड़कियों के प्रति समाज में उपेक्षा का भाव या यह इच्छा कि लडक़ी पैदा ही न हो उसकी वजह यह दहेज भी है.

अब शासन ने सामाजिक व्यवस्था में इस दहेज को खत्म और दंडनीय अपराध बना दिया और लडक़ी को सीधा-सीधा मां-बाप ही जायदाद में लडक़ों के समान बराबरी का हक दे दिया. लेकिन जब इस कानून का दुरुपयोग भी सामने आने लगा कि पारिवारिक झगड़ों में न होते हुए भी दहेज का अपराध लडक़ी की ससुराल पक्ष पर लगा ही दिया जाता है. अब समाज व शासन विचार करने लगा है कि दहेज विरोधी कानून का दुरुपयोग भी रोका जाना चाहिए.

अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट भी आगे आ गया है. उसने यह पाया है कि अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति में कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है. इस कानून के तहत कई फर्जी मामले सामने आ चुके हैं. कुछ लोग अपने फायदे और दूसरों को नुकसान पहुंचाने के लिये इस कानून को दुरुपयोग करने लगे. शासकीय सेवकों के खिलाफ झूठी शिकायत करने से गिरफ्तारी, मुकदमे आदि से प्रताडि़त होने लगे हैं.

अब सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था व नये दिशा-निर्देश दिये हैं कि इस एक्ट के तहत शिकायत आने पर किसी भी शासकीय लोक सेवक (पब्लिक सर्वेंट) की तत्काल गिरफ्तारी नहीं होगी. पहले डी.एस.पी. स्तर का पुलिस अधिकारी जांच करेगा. गिरफ्तारी से पहले जमानत भी दी जा सकती है. जिस शासकीय व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाएगा उसके लिये उसके उच्च अधिकारी से अनुमति ली जाए.