इंदौर के डीपीएस बस हादसे में स्कूल प्रिंसीपल को दोषी मानते हुए उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. अब फिर यह एक विवाद का विषय बन गया है कि बस दुर्घटना में प्रिंसीपल की क्या जिम्मेदारी है? प्रशासन और पुलिस इस पर निर्णय न कर पाते हुए कुछ दिनों तक असमंजस में रहे और अंतत: उन्हें थाने बुलाकर गिरफ्तार कर लिया गया.

इसके बाद सौ से ज्यादा प्राचार्यों ने बैठक की और प्रिंसीपल पर लगाई गई धाराओं को हटाने की मांग की. यह चेतावनी भी दी कि सात दिन में मांगें नहीं मानी गईं तो स्कूलों से संचालित बसों को बंद कर दिया जाएगा. शिक्षकों की ओर से यह भी कहा जा रहा है कि प्राचार्यों का काम अकादमिक होता है. ऐसे कार्यों में यदि प्रिंसीपल को जेल भेजा जाएगा तो हम सभी प्राचार्य इस्तीफा दे देंगे!

डीपीएस हादसे के बाद सवाल यह भी उठाए जा रहे हैं कि मजिस्ट्रियल जांच में तो आरटीआई आदि भी दोषी है तब उनके खिलाफ इस तरह की कार्रवाई क्यों नहीं की गई? यह भी कहा जा रहा है कि एआईसीटीएल की बसों से यदि कोई दुर्घटना घटती है तो क्या अध्यक्ष को गिरफ्तार किया जाता है? सोनार की गिरफ्तारी के विरोध में देश के अनेक क्षेत्रों के प्राचार्य जेल के बाहर एकत्रित हो गए थे.

इस समग्र घटनाक्रम पर यह निर्विवाद सत्य बिन्दु है कि बच्चों की चिंता प्राथमिकता के साथ होना चाहिए. यह घटना भी अति दुखद रही है. लेकिन जहां तक प्रिंसीपल की गिरफ्तारी की बात है प्रिंसीपल एक अकादमिक पद है और उनका कार्य शैक्षणिक होता है.

इसलिए शिक्षकों और प्राचार्यों के पक्ष पर भी गौर किया जाना चाहिए, लेकिन जैसा कि खबरें आ रही हैं, प्रिंसीपल ने प्रशासनिक जिम्मेदारी भी सम्हाल रखी थी, तब सवाल यह उठता है कि क्या वह बसों के रखरखाव की जिम्मेदारी का निर्वहन भी कर रहे थे? प्राचार्यों को स्वयं शैक्षणिक दायरों तक की जिम्मेदारी लेना चाहिए. प्रबंधकीय दायित्व तो प्रबंधकों को सौंपना चाहिए ताकि वे अपने अकादमिक पेशे के साथ न्याय कर सकें.

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