खाद्यान्न के मामले में भारत की इतनी मजबूत स्थिति हो गई है कि गेहूं के उत्पादन में बाहुल्य हो गया है. इसकी उपज इतनी अधिक हो गई है कि इसके भंडारण की भी गंभीर समस्या बन गई. भारत गेहूं का निर्यातक देश बन गया है. अनाज की सबसे बड़ी प्राकृतिक समस्या यह है कि इसे आधिक्य के दिनों में कभी कमी हो जाने की दशा में आपूर्ति के लिये लंबे समय तक रखा नहीं जा सकता. चावल को छोड़कर लगभग सभी अनाजों, दलहनों व तिलहनों की खपत तिथि (एक्सपायरी डेट) लगभग एक साल की होती है. यह प्रकृति का नियम है कि हर साल नई फसल लेना है.

स्वाधीनता के समय भारत का सबसे बड़ा आयात अनाज का ही होता था. इसके लिये हम बड़ी दीनता से दूसरे देशों पर आश्रित रहते थे, लेकिन दो दशक पूर्व ही 50 सालों में भारत ने अपने को खाद्यान्न में हरित क्रांति कर देश को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर कर लिया. स्थानीय किसानों, कृषि अधिकारियों, कृषि वैज्ञानिकों के प्रयास के साथ इसका श्रेय कृषि वैज्ञानिक डॉ. बोरलोग को जाता है. इसमें भी स्वीकार करना होगा कि रासायनिक खादों ने खेतों को अति उत्पादन व आधुनिक रूप दिया है. गेहूं के उत्पादन में देश में पंजाब प्रथम, हरियाणा द्वितीय व तीसरे स्थान पर मध्य प्रदेश है. उत्तर प्रदेश में भी विपुल मात्रा में गेहूं होता है. यह राज्य कभी मध्य प्रदेश से आगे तीसरे स्थान पर हुआ करता था. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य संगठन एफ.ए.ओ. ने अनुमान लगाया है कि भारत में अनाजों के उत्पादनों में वृद्घि होगी. इनका उत्पादन लगभग 6 प्रतिशत बढ़कर 23 करोड़ टन पर पहुंच जायेगा.

भारत में मुख्यता खाने का अनाज गेहूं व चावल है. नर्मदा नदी से ऊपर उत्तर भारत में गेहूं और दक्षिण भारत के राज्यों में चावल मुख्य भोजन है. कभी यह स्थिति थी कि भारत के गांव का अर्थ गरीब भी होता था और गांवों के लोगों का मुख्य भोजन मोटा अनाज ज्वार, बाजारा, मक्का, कोदो कुटकी हुआ करता था, लेकिन अब गांवों में भी गेहूं व चावल मुख्य भोजन बन गये हैं. अब भारत में चावल की पैदावार भी काफी बढ़ रही है. खाड़ी मुल्कों के इस्लामी राष्ट्रों में भारत का बासमती मुख्य अनाज है. अगर उनका पेट्रो तेल हमारी अर्थ व्यवस्था को प्रभावित करता है तो भारत के बासमती की कमी या बढ़ी कीमतों से उनकी अर्थ व्यवस्था भी डगमगा जाती है.

देहरादून की बासमती- यह नाम सिक्के की तरह व्यापार में चलता है. ताजा अनुमानों के अनुसार इस खरीफ मौसम देश का कुल चावल उत्पादन 871 लाख टन तक हो जायेगा. जबकि पिछले साल यह 807 लाख टन था. भारत में चावल आपूर्ति की घरेलू जरूरत को बनाये रखने के लिये पिछले 4 सालों में चावल के निर्यात पर प्रतिबंध था. केवल खाड़ी देशों के लिये बासमती चावल पर कुछ छूट दे दी जाती थी. गत सितंबर में यह निर्यात प्रतिबंध उठा लिया गया है और निजी क्षेत्र को 20 लाख टन चावल निर्यात की अनुमति दे दी गई है. अगले साल यह बढ़कर 50 लाख टन का निर्यात हो जायेगा. गत जून से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में चावल के भावों में तेजी चल रही है. भारत के पड़ोसी राष्ट्र बर्मा, थाईलैंड व चीन चावल उत्पादक राष्ट्र है. भारत अभी खाद्यान्न तेलों में आत्मनिर्भर नहीं है. भारत की घरेलू खपत लगभग 115 लाख टन है और हम इसका 45 प्रतिशत भाग आयात करते हैं. भारत की घरेलू खपत 6-7 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रही है.

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