नवभारत न्यूजभोपाल,

“प्रदेश के समाजवादी आंदोलन के पुरोधा एवं विंध्य के सफेद शेर कहे जाने वाले श्रीयुत श्रीनिवास तिवारी अब नहीं रहे. दो बार विधानसभा अध्यक्ष रहे श्रीयुत श्रीनिवास तिवारी ने संसदीय इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और जो परंपरा उन्होंने आसंदी से बनाई वे आज भी कायम हैं. उनको विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए हम उनके जीवन सफर के मुख्य अंश प्रस्तुत कर रहे हैं.”

तिवनी ग्राम का नाम लेते ही एक प्रखर एवं पुष्ठ पौरुष सम्मुख आता है. लम्बा-चौड़ा बलिष्ठ शरीर, सिर के धवल बाल घनी श्वेत भौंहें जो इनकी गम्भीरता को प्रगट करती हैं. अतलदर्शी नेत्र जैसे, दोनों नेत्र सामने वाले के अन्त: में प्रवेश कर रहे हों. सतर्क बड़े-बड़े कान सबकी बातें ध्यान से सुनने वाले. बड़ी नाक जो बताती है कि यह व्यक्ति अपनी प्रतिष्ठा के लिए सावधान है. यह शीघ्र ही व्यक्तियों को पहचान लेता है.

कर्मठ बलिष्ठ भुजाएँ सिर में लटकती हुई आबध्य शिखा और धवल वस्त्रों से सुसज्जित देह. इस व्यक्ति में दूसरों के अन्त: में प्रवेश करके उसके मंगल रूप को पहचानने की अद्भुत प्रतिभा और शक्ति है. ऐसे व्यक्ति को यहाँ की वायु ने पलने में झुलाया, पुचकारा और दुलराया है. यहाँ के पानी ने इसे यश प्रशस्ति का अमरत्व प्रदान किया. तिवनी का ऐसा यह अमूल्य रत्न आज अपने आलोक से पूरे देश को आलोकित कर रहा है.

प्रखर समाजवादी चिन्तक, संसदीय प्रक्रियाओं के मर्मज्ञ, संवैधानिक विधिवेत्ता, निर्भीक और यशस्वी राजनेता श्रीयुत श्रीनिवास तिवारी का जन्म 17 सितम्बर 1926 को उनके ननिहाल रीवा जिले के शाहपुर (क्योंटी) के ग्रामीण परिवेश में हुआ.

ग्रामीण सद्भाव और संस्कृति के वातावरण में परवरिस की अमिट छाप उनके निश्छल व्यक्तित्व और निस्कपट व्यवहार में आज भी झलकती है. उनकी प्रारम्भिक शिक्षा पिता स्व. श्री मंगलदीन तिवारी के कठोर अनुशासन और मार्गदर्शन में हुई. वे प्राथमिक शिक्षा से ही मेधावी छात्र रहे हैं.

जन्म एवं विवाह 

कहते हैं होनहार विरवान के होत चीकने पात. श्रीनिवास तिवारी बचपन से ही प्रतिभावान एवं विलक्षण थे. उनका जन्म तिवनी ग्राम के प्रतिष्ठित मध्यवर्गीय किसान मंगलदीन तिवारी के तृतीय पुत्र के रूप में ननिहाल शाहपुर में 17 सितम्बर 1926 की पावन वेला में हुआ. माता कौशिल्या देवी सहृदय महिला थीं जिनका संस्कार श्रीतिवारी को मिला. सतना जिला के झिरिया ग्राम के पं. रामनिरंजन मिश्र की पुत्री श्रवण कुमारी के साथ श्रीतिवारी का विवाह दिनांक 21/5/1937 दिन शुक्रवार को 11 वर्ष की अवस्था में सम्पन्न हुआ.

1985 में नहीं लड़ पाए चुनाव

1985 में टिकट नहीं मिलने के कारण श्री तिवारी विधान सभा का चुनाव नहीं लड़ पाए थे, जिस पर उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि टिकट का न मिलना कांग्रेस के शीर्षस्थ नेतृत्व का कारण नहीं मध्यान्ह का अवरोध है. अत: मैं कांग्रेस में ही रहकर अपने कार्यों को अंजाम दूँगा. श्रीतिवारी ने नामजदगी का पर्चा वापस ले लिया.

विधायक के रूप में सक्रिय राजनीति

24 वर्ष की अल्पायु में 1952 में पहली बार विधायक चुने जाने के बाद श्रीतिवारी की राजनीति में सक्रिय भूमिका प्रारंभ हुई. समाजवादी आन्दोलन से जुड़े होने के कारण श्रीतिवारी ने सर्वहारा वर्ग के उत्थान के लिए सडक़ से लेकर विधानसभा तक अपनी बात रखी. श्रीतिवारी पंचायतीराज के पक्षधर थे उन्होंने कहा कि सबसे पहले पंचायतों का चुनाव होना चाहिए. अगर ग्राम पंचायतें कहीं अनुभव करती हैं कि उन्हें टैक्स लगाना है तो खुद वहाँ की जनता की राय से टैक्स लगा सकती है और वसूल कर सकती है, आप छोड़ दीजिए उनके ऊपर पूरी तौर से.

1990 में बने थे विधानसभा उपाध्यक्ष 

श्रीतिवारी को 22 मार्च 1990 को विधान सभा का उपाध्यक्ष चुना गया. विधानसभा के इतिहास में पहली बार यह हुआ कि सत्तापक्ष ने प्रजातंत्र के मूल्यों और मापदण्डों के अनुरूप उसे और श्रेष्ठता प्रदान करने के लिए अपनी ओर से प्रस्ताव किया कि सदन के उपाध्यक्ष का गरिमामय पद प्रतिपक्ष के कोई माननीय सदस्य सुशोभित करें. सदन के उपाध्यक्ष रह कर श्रीतिवारी ने उच्च परंपराओं का पालन करते हुए सदन के संचालन की नई परिभाषा गढ़ी. अगर सदन की मर्यादा रहेगी तो सभी की मर्यादा रहेगी.

 

24 साल की उम्र में बने थे विधायक

समाजवादी पार्टी से 1952 के प्रथम आम चुनाव में जब श्रीनिवास तिवारी को मनगवाँ विधान सभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया गया तब उनके सामने भारी आर्थिक संकट था और यह समस्या थी कि चुनाव कैसे लड़ा जाए? ऐसे में गाँव के ही स्व. कामता प्रसाद तिवारी ने कहा चुनाव तो लडऩा ही है धन की व्यवस्था मैं करूँगा.

उन्होंने अपने घर का सोना रीवा में 500 रुपये में गिरवी रखकर रकम श्रीतिवारी को चुनाव लडऩे के लिए सौंप दी. इसी धन राशि से चुनाव लड़ा गया और श्रीतिवारी को विजयश्री मिली. यहीं से उनके राजनीतिक जीवन का उद्भव प्रारंभ हुआ.

दो बार चुने गए अध्यक्ष

मनगवाँ क्षेत्र से विधायक चुनकर गये श्रीनिवास तिवारी को 24 दिसम्बर 1993 को पहली बार मध्य प्रदेश विधान सभा का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया. उनके निर्वाचन पर तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा था कि मैं समझता हूँ आज आप जिस पद को सुशोभित करने जा रहे हैं उससे इस विधान सभा की गरिमा बढ़ेगी. वहीं प्रथम बार अध्यक्ष बनने पर श्रीतिवारी ने अपन उद्बोधन में कहा था कि हम सभी लोगों का प्रयास होना चाहिए कि सदन की गरिमा, मार्यादा अक्षुण्य बनी रहे.

जमींदारी प्रथा का विरोध 

श्रीनिवास तिवारी ने जमींदारी प्रथा के विरोध में मध्य प्रदेश की विधान सभा में लगातार सात घण्टे तक भाषण देकर इतिहास रचा था. श्री तिवारी मूलत: किसान के बेटे थे. वे किसानों का दुख दर्द समझते थे. तत्कालीन समय में सामंतों द्वारा किसानों का व्यापक शोषण किया जा रहा था. किसानों का उत्पादन का अधिकांश भाग छीन लेना एवं मजदूरों से बेगारी कराना आम हो गया था.

किसानों एवं मजदूरों की पीड़ा श्री तिवारी से देखी नहीं गई और वे सामंतवाद के विरोध में लोहिया द्वारा चलाए जा रहे आन्दोलन में सक्रिय हो गए जिससे वे जमींदारों के विरोधी हो गये. इनका नारा था ‘‘भूखी जनता चुप न रहेगी, धन और धरती बट कर रहेगी’’. 1948 तक 50 फीसदी किसान जमीन से बेदखल किए जा चुके थे.

श्रीनिवास तिवारी, यमुना प्रसाद शास्त्री और जगदीश जोशी ने संयुक्त एवं पृथक रूप से रीवा एवं सीधी का दौरा किया और जहाँ किसान बेदखल किए गये थे संगठन बनाकर सरकार को बेदखली के निर्णय को वापस लेने के लिए विवश किया.

इसी चलते 1948 में सरकार ने टेनेंसी एक्ट में किसानों के लाभ के लिए संशोधन करने की घोषणा की. इस आन्दोलन में श्री तिवारी की महत्वपूर्ण भूमिका रही. फलस्वरूप समाजवादी नेताओं के खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरू कर दी गई. इन्हें रीवा से बाहर जाने पर पाबंदी लगा दी गई थी और श्रीतिवारी सहित अन्य नेताओं को जेल भेज दिया गया.

राजनैतिक सफर

श्रीनिवास तिवारी का राजनैतिक सफर कांटों भरा ही रहा है. बचपन से ही श्रीनिवास तिवारी पर स्वतंत्रता आन्दोलन एवं समाजवादी आन्दोलन का प्रभाव पड़ा. जब वे कक्षा 8 वीं में मार्तण्ड स्कूल में छात्र थे तभी स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़ गये थे. दरबार कालेज में आकर उन्होने डिबेटिंग क्लब बनाया एवं दरबार कालेज के महामंत्री भी रहे. उनमें अद्भुत संगठनात्मक क्षमता थी, छात्र जीवन में राजनीति का जो अंकुर फूटा वह समय के साथ आकार लेता गया.

श्री तिवारी समाजवादी विचारधारा एवं समाजवादी आन्दोलन से जुड़े. लोहिया के समाजवाद से वे प्रभावित थे और डॉ. राम मनोहर लोहिया का उन्हें भरपूर स्नेह मिला. जमींदारी प्रथा का विरोध करते हुए उन्हें कृष्णपाल सिंह, ओंकारनाथ खरे, श्रवण कुमार भट्ट, चन्द्रकिशोर टण्डन, हरिशंकर, मथुरा प्रसाद गौतम, ठाकुर प्रसाद मिश्र, सिद्धविनायक द्विवेदी, जगदीश चन्द्र जोशी, यमुना प्रसाद शास्त्री, चन्द्रप्रताप तिवारी, अच्युतानंद मिश्र, महावीर सोलंकी, शिव कुमार शर्मा तथा लक्ष्मण सिंह तिवारी आदि का साथ मिला.

 

Related Posts: