दूरस्थ और दुर्गम ग्रामीण अंचलों में रसोई गैस (एलपीजी) की आपूर्ति, सिलैंडर के दाम, भोजन निर्माण और जीवन की गुणवत्ता में परस्पर संबंध है। लघु वन उपजों के संग्रहण और छोटी-छोटी जोतों के जरिए वर्षा आधारित खेती करने वाले परिवारों के लिए भोजन निर्माण की व्यवस्था प्रतिदिन की समस्या है। इसके समाधान में सौर ऊर्जा सहायक है। इसे अपनाने के लिए जन जागरण की आवश्यकता है।

मानव सभ्यता के विकास के साथ ही जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए हर काल और समय में क्रांतियां सामने आई। बौद्धिक क्रांति ने ज्ञान आधारित व्यवस्था के विकास पर बल दिया तो औद्योगिक क्रांति ने रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए।

अन्नादाता किसानों और कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग से भारत के खेतों में उतरी हरित क्रांति ने अन्ना भंडारों को भरने, पोषण की गुणवत्ता में सुधार तथा खाद्यान्ना आयात रोक विदेशी मुद्रा के भंडार पर दबाव कम किया।

श्वेत क्रांति ने दूध की कमी दूर की। विदेशों से दुग्ध चूर्ण (मिल्क पाऊडर) आयात रूकवाया। देश भर में दूध आपूर्ति सुनिश्चित की। नीली क्रांति ने एक तरफ खेती में नील-हरित शैवालों (एल्गी) के जरिए नत्रजन स्थिरीकरण में मदद की, वहीं छोटी-छोटी डबरियों में मछली पालन को प्रोत्साहन दिया।

पीली क्रांति यानी सोया उत्पादन ने ग्रामीण क्षेत्रों की मुंडेरों पर संपन्नाता का दीप-दीपन किया। सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति ने विश्व को छोटे गांव में बदल दिया। जैव प्रौद्योगिकी क्रांति ने संकर बीज उत्पादन की तकनीक की गुणवत्ता सुधारी और बायोटेक बीज के तोहफे दिए।

नवीन ऊर्जा क्रांति ने सौर ऊर्जा, जैव ईंधन, पवन ऊर्जा के उपयोग की प्रेरणा दी। ग्रामीण इलाकों में जहां अभावग्रस्तों की खरीद क्षमता काफी कमजोर है, उनके लिए सौर ऊर्जा वरदान है। इस ऊर्जा के उपयोग को आत्मसात कर नवीन ऊर्जा क्रांति को तीसरी सहााब्दी की क्रांति के रूप में परिचित करने की आवश्यकता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी महिलाएं सुबह ईंधन की तलाश में जंगलों में घूमती है। लकड़ियां और उपले (कंडे) बीन कर भोजन निर्माण के लिए ईंधन की व्यवस्था करती हैं। बारिश में तो स्थिति और विकट हो जाती है। रास्ते दुर्गम और ईंधन सामग्री गीली। तब धुंए से भरी टपरियों में समय पर भोजन निर्माण समस्या होती है।

कई परिवारों में समय पर भोजन निर्माण नहीं हो पाने की स्थिति में बच्चे भूखे सो जाते हैं। माताएं उन्हें नींद से जगा भोजन कराने का प्रयास करती है। दुर्गम मार्गों के जरिए गैस सिलेंडर की आपूर्ति कठिनाई भरी, ऊपर से रसोई गैस सिलेंडर के दाम लघु, सीमांत और भूमिहीन किसानों के लिए असहनीय। ईंधन गीला और धुंआ अधिक। जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले इन कारकों से छुटकारे के लिए सौर ऊर्जा उपयोग को बढ़ावा देना समय की मांग है।

सौर ऊर्जा प्रणाली का उपयोग सहज और सरल है। यह प्रकृति के प्रति मित्रवत है। एक बार की लागत और लंबे समय तक मुफ्त में ईंधन और प्रकाश की व्यवस्था। न कहीं भटकने की जरूरत न ही खाना पकाने में देरी। सौर कूकर में खाना पकाने रखिए और अन्य कार्य भी करते रहिए। समय पर गुणवत्तापूर्ण भोजन तैयार। केवल सही आयोजना की आवश्यकता है।

सरकार ने भी नवीन ऊर्जा उपयोग को बढ़ावा देने के लिए अनेक योजनाएं शुरू की है। उनका लाभ ले सकते हैं। इंदौर के पास सनावदिया ग्राम में पद्मश्री जनक दीदी के प्रयासों से सौर ऊर्जा का उपयोग जगमग है। गांव के युवक ने सौर ऊर्जा के उपयोग से टी स्टॉल भी शुरू किया है।

पौड़ी गढ़वाल के गांव उपरेखाल में तो “”आसमान में जितने तारे उतने तपते हैं, धमतप्पु (सोलर पैनल)”” की कहावत जमीन पर उतारने के प्रयास हैं। सनावदिया ग्राम में सौर ऊर्जा से खाना पकाने और कृषि उत्पाद संरक्षण का प्रशिक्षण दिया जाता है। ऐसे ही प्रशिक्षण आदिवासी बाहुल्य जिले झाबुआ में भी दिए जाते हैं। ग्रामीणजन सौर ऊर्जा आधारित इन कार्यक्रमों का लाभ ले, जीवन की गुणवत्ता में सुधार ला सकते हैं।

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