भोपाल, जनजातीय संग्रहालय में परम्परा, नवप्रयोगों एवं नवांकुरों के लिए स्थापित श्रृंखला उत्तराधिकार में आज जुगलबंदी (सुरबहार एवं गिटार) और कुचिपुड़ी समूह नृत्य की प्रस्तुतियां हुई.
श्रृंखला की पहली प्रस्तुति में आज उस्ताद जिया फरीदउद्दीन डागर के शिष्य राजेंद्र विश्वरूप एवं प्रसिद्ध मोरोन शैली के जुआन डे ला मोरोन के शिष्य संजीव ने सुरबहार एवं गिटार(फ्लेमेंको) की जुगलबंदी प्रस्तुत की.

राजेंद्र विश्वरूप और संजीव ने राग यमन से प्रारंभ करते हुये आलाप, जोड़, झाला में सुरबहार पर ध्रुपद एवं गिटार पर फ्लामेंको के वादन के नवप्रयोग से श्रोताओं को मोह लिया. इस प्रस्तुति में तबले पर डॉ. विनय बिंदे ने संगत की, पखावज पर साथ दिया जयवंत गायकवाड ने और काहुन पर सत्यम आरख ने साथ दिया. संगतकारों ने सधी हुई सगंत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया.

राजेंद्र विश्वरूप ‘सुरबहार’ और ‘सरस्वती वीणा’ को बजाने की विशिष्ट शैली नख करतारी के लिए प्रसिद्ध हैं वहीं संजीव भारत के चुनिंदा फ्लेमेंको गिटार वादकों में से एक है. संजीव का जन्म एंडूलूसिया (दक्षिण स्पेन) में हुआ. संजीव ने भारतीय शास्त्रीय संगीत (वादन और गायन ) की शिक्षा, डॉ.प्रकाश सोंताके और उस्ताद महबूब नदीम से आठ वर्षों तक प्राप्त की.

 

जुगलबंदी के पश्चात दूसरी प्रस्तुति में साईं नटराज कुचिपुड़ी नृत्य संस्थान हैदराबाद की संस्थापक डॉपीरमादेवी ने अपनी शिष्याओं के साथ कुचिपुड़ी समूह नृत्य प्रस्तुत किया. रमा देवी ने अपनी शिष्याओं के साथ नृत्य की शुरुआत महिषासुरमर्दिनी से प्रेरित नाट्य नृत्य से की, इसके पश्चात शंकर गिरी, बृज गोपालम और अंत में देव देवं भज पर कुचिपुड़ी नृत्य प्रस्तुत किया.

रमा देवी के साथ उनकी शिष्याओं राजा राजेश्वरी, अक्षरा, मेघना, ऐश्वर्य, दिव्या, प्रेरणा, सध्विका, नम्रिता ने नृत्य प्रस्तुत किया. वहीं संगतकारों में वायलिन पर साईं कुमार, बांसुरी पर उमा वेंकटेश्वरी, गायन में श्रीवल्ली शर्मा और श्वेता प्रसाद ने साथ दिया.

भारतीय नृत्य शैलियों में कुचिपुड़ी नृत्य प्राचीन नृत्य शैलियों में से एक है. यह नृत्य विधा मूलत: आंध्रप्रदेश की है. इस नृत्य को नृत्य नाटिका परम्परा से भी प्रेरित मानते हैं. डॉ.पी.रमादेवी कुचिपुड़ी नृत्य में पीएचडी हैं. उन्होंने तकऱीबन 50 से अधिक प्रस्तुतियों की आख्यानों के नवप्रयोगों के साथ कोरियोग्राफी की है.
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