नयी दिल्ली,

दिल्ली उच्च न्यायालय ने देहरादून में एमबीए छात्र रणवीर सिंह की फर्जी मुठभेड़ मामले में सात पुलिसकर्मियों की आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी है। इसी मामले में आजीवन कारावास की सजा पाये 10 अन्य पुलिसकर्मियों को न्यायालय ने बरी कर दिया है।

यह मामला तीन जुलाई 2009 का है। तीस हजारी अदालत ने अपने फैसले में 18 पुलिसकर्मियों को इस मामले में सजा सुनाई थी जिसको उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी। निचली अदालत ने 17 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति एस मुरलीधर और आई एस मेहता ने की खंडपीठ ने निचली अदालत के नौ जून 2014 को सुनाये गये फैसले में सात पुलिस कर्मियों की आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी जबकि इसी मामले में आजीवन कारावास की सजा पाये 10 अन्य पुलिस कर्मियों को बरी कर दिया।

तीस हजारी अदालत ने जून 2014 को अपने फैसले में 17 पुलिस कर्मियों को हत्या, अपहरण, साक्ष्य मिटाने और आपराधिक साजिश रचने और उसे अंजाम देने के मामले में दोषी करार देते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई थी। जसपाल सिंह गोसांई को हत्या, अपहरण और सबूत मिटाने के मामले में बरी किया था लेकिन उसे भारतीय दंड विधान की धारा 218 के तहत गलत सरकारी रिकार्ड तैयार करने के मामले में दोषी पाया था।

बाइस वर्षीय रणवीर सिंह गाजियाबाद के शालीमार गार्डन का रहने वाला था और नौकरी के लिए देहरादून गया था जहां उसकी फर्जी मुठभेड में हत्या कर दी गयी थी। यह मामला केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपा गया।

जांच में खुलासा हुआ कि उत्तराखंड पुलिस ने दुश्मनी के तहत रणवीर सिंह की फर्जी मुठभेड़ में हत्या कर दी थी। उसके शरीर पर 29 गोलियों के निशान पाये गए थे, जिसमें से 17 गोलियां नजदीक से मारी गयीं थी। सीबीआई ने अपनी जांच में 18 पुलिसकर्मियों को आरोपी पाया और इन पर मुकदमा चला।

सीबीआई के इस मामले का खुलासा करने में आरोपी पुलिसकर्मियों ने स्वयं को बचाने के लिए अपने रसूख का इस्तेमाल किया। न्याय नहीं मिलने की उम्मीद में मृतक के परिजनों ने उच्चतम न्यायालय में नौ मार्च 2010 को याचिका दायर की और इसके बाद मुकदमे को देहरादून की विशेष अदालत से तीस हजारी स्थानांतरित किया गया था।