सिंघवी द्वारा राज्यपाल के अधिकार को चुनौती देने से भटक गया मुद्दा

प्रवेश कुमार मिश्र
नई दिल्ली,

कर्नाटक मसले पर सर्वोच्च न्यायालय में देर रात हुई ऐतिहासिक बहस में कांग्रेस की ओर से दी गई कमजोर व तथ्यों से परे दलील के कारण ही भाजपा को मौका मिल गया है. जानकार मान रहे हैं कि वरिष्ठ अधिवक्ता व कांग्रेसी सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने मुद्दा से भटक कर जिस तरह से राज्यपाल के अधिकार को चुनौती दी वह निश्चित तौर पर नुकसानदेह साबित हुआ.

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय में सही ढंग से मुद्दे को उठाने की चूक ने कांग्रेस व जेडीएस को बैकफुट पर लाकर खड़ा कर दिया है. उक्त नेता ने कहा कि मुद्दा यह है कि राज्यपाल को मिले संवैधानिक अधिकारों का सही अनुपालन हुआ है या नहीं ? यदि बहस इस विषय पर केंद्रित होती तो यह सर्वविदित है कि राज्यपाल ने अनिश्चितता को बढ़ावा दिया है.

राज्य में तीन पक्ष हैं जिसमें दो पक्ष बहुमत के साथ खड़ा है ऐसे में अल्पमत वाले समूह को मौका देना न सिर्फ गैरवाजिब है बल्कि जोड़-तोड़ व खरीद-फरोख्त को प्रश्रय और बढ़ावा देने जैसा है. इसलिए सिंघवी को राज्यपाल के अधिकार के बजाय व्यवस्था को संरक्षण देने की बात रखनी चाहिए थी.

इतना ही नहीं उक्त नेता ने कहा कि राज्यपाल को मिले संवैधानिक अधिकार किसी पार्टी के सदस्य के तौर पर नहीं मिला है बल्कि यह अधिकार संविधान द्वारा संविधान की रक्षा करने के लिए दी गई है. इसलिए दलील का आधार यह होना चाहिए था कि जब आंकड़ों के मुताबिक किसी भी हाल में दूसरे पक्ष की एकजुटता को खत्म किए बगैर भाजपा बहुमत नहीं जुटा सकती है.

ऐसे में दलों को विखंडित करने का मौका क्यों दिया गया? उक्त नेता मान रहे हैं कि यदि कोर्ट में उक्त सभी तथ्यों के साथ व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया गया होता तो निश्चित रूप से विपक्षी दलील पर सिंघवी की दलील भारी पड़ जाती.

बहरहाल कांग्रेसी रणनीतिकारों को शुक्रवार को सर्वोच्च न्यायालय में ठोस व तार्किक तथ्यों के साथ मैदान में उतरने के एक और मौका के साथ-साथ मौजूदा कुनबे को एकजुट रखने की चुनौती भी है.इसलिए अब सबकी निगाह सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर केंद्रित है.

राज्यपाल की जिम्मेदारी नहीं

भाजपा समेत कांग्रेस व जेडीएस के विधायक भी पार्टी द्वारा निर्गत किए गए चुनाव चिन्ह पर ही चुनाव लड़े है और विजयी होकर आए हैं. ऐसे में उनकी व्यक्तिगत पसंद व नापसंद का कोई मतलब नहीं है.

यदि वे किसी निर्णय से नाराज भी हैं तो यह देखने की जिम्मेदारी राज्यपाल की नहीं होती है बल्कि संवैधानिक व्यवस्था के तहत दो तिहाई सदस्यों के बगैर दल में टूट अमान्य है. ऐसे में भाजपा के पास बगैर टूट या अन्य असंवैधानिक हथकंडों हथकंडों को अपनाए बगैर समर्थन की भी गुंजाइश नहीं है.