चुनाव के साल में राजनैतिक दलों में दबाव की राजनीति बनना आमतौर पर होता ही चला आया है.सन् 60 के दशक में जब से संविद सरकारों के दौर से साझा सरकारों का दौर आया है दबाव की राजनीति एक आम प्रक्रिया हो गयी है. इस समय केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की मोदी सरकार को स्वयं का बहुमत प्राप्त है- फिर भी वह भी अपना एन.डी.ए. पार्टियों का गठबंधन बनाये हुए है.

जब साझा सरकार बनती है तो बड़ी पार्टी ही बड़ी होती है लेकिन साझा सरकार बनते ही छोटी पार्टियां उस पर अपना दबाव कायम करने लगती हैं. उनकी राजनीति का गणित यह देखता है कि उनकी सदस्य संख्या सरकार के अस्तित्व बनाये रखने में क्या हैसियत रखती है. इस समय श्रीराम विलास पासवान की पार्टी अपने सांसदों के आधार पर अपना महत्व खो चुकी है. उन्हें जो मंत्री पद दिया गया है उसमें एक एन.डी.ए. में होने का धर्म निभाया गया और वे भी मानते हैं कि जो मिल गया वही काफी है.

इस समय महाराष्ट्र आधारित शिवसेना और आंध्र आधारित मुख्यमंत्री श्री चंद्रबाबू नायडू की तेलगुदेशम पार्टी ने मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी को धमकाना शुरू कर दिया है कि वे अगला चुनाव उनके अकेले दमखम से ही लड़ेंगे और एन.डी.ए. गठबंधन से पृथक हो जायेंगे. इन दोनों पार्टियों की राजनैतिक सूबेदारी उनके राज्यों तक ही सीमित है और वे आगामी चुनावों में उनकी सांसद व विधायक संख्या में बढ़ोत्री देखना चाहते हैं, इसी से उनका राजनैतिक रुतबा बनेगा.

शिवसेना की यह महत्वाकांक्षा होना स्वाभाविक है कि अपने स्वयं के बहुमत से महाराष्ट्र में सरकार बनाये. इस समय भाजपा बड़ी पार्टी है और मुख्यमंत्री उनका ही है. कभी महाराष्ट्र में शिव सेना के मुख्य मंत्री भी रहे हैं. आंध्र में एन.टी. रामाराव के निधन के बाद उनके परिवार में बिखराव के कारण अब श्री चन्द्रबाबू नायडू ही तेलगूदेशम पार्टी के सर्वेसर्वा हैं और लोकसभा चुनावों में उनकी पार्टी के लिए काफी सीटें मांग सकते हैं.

मोदी सरकार ने राजनैतिक दबाव में आकर आंध्र में से काटकर तेलंगाना राज्य तो बनवा दिया लेकिन दोनों आंध्र व तेलंगाना की तेलगूभाषी जनता भारतीय जनता पार्टी के विरुद्ध हो गयी है. तेलंगाना में मुख्यमंत्री एन. टी.आर.एम. राव ने जो मुख्यमंत्री निवास के लिये महलनुमा बंगला बनवाया और परिवार जनों को मंत्री बना दिया. वहां की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी के कदम जमे नहीं हैं.

बिहार में चुनावी मैदान काफी दिलचस्प हो सकता है. भारतीय जनता पार्टी का एक बड़ा वर्ग इस बात से नाराज है कि नीतिश कुमार ने भाजपा का साथ छोडक़र लालू के राष्ट्रीय जनता दल के साथ सरकार बनायी. अब उसे छोडक़र फिर भाजपा के साथ सरकार बनी. पार्टी को यह नहीं करना था. बिहार के भाजपा के कद्दावर नेता श्री यशवंत सिन्हा राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ बनाकर मोदी सरकार के तीव्र आलोचक बन गये हैं.

इन दिनों मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर में कलेक्टरेट के सामने धरने पर बैठे हैं. उनके साथ शत्रुघन सिन्हा भी जुड़ गये हैं. शत्रुघ्न सिन्हा को पहले एनडीए सरकार में मंत्री बनाया गया लेकिन वे चल नहीं पाये और दरकिनार कर दिये गये. श्री यशवंत सिन्हा पर यह आक्षेप है कि वे गवर्नर बनना चाहते थे पर नहीं बनाये गये. पार्टी का कहना है कि उनके लडक़े जयंत सिन्हा को केंद्रीय मंत्री मंडल में ले लिया गया है यही काफी है.

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