सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को एक फैसले में एस.सी./एस.टी. एक्ट के तहत इसे लागू करने में एक गाइड लाइन तय की है कि इसके तहत मामलों में कैसे लागू किया जाए. दहेज कानून की तरह एस.सी.-एस.टी. एक्ट के मामले में भी इसके दुरुपयोग के मामले अदालतों में आ चुके हैं.

इसी संदर्भ में इसका दुरुपयोग रोकने के लिये तय किया गया कि एक सक्षम पुलिस अधिकारी पहले ऐसी शिकायतों में प्राइमा फेसी देखेगा. तब मामला रजिस्टर्ड होगा और गिरफ्तारी में भी जमानत का प्रावधान होगा. यह एक्ट में संशोधन नहीं है बल्कि क्रिमिनल व सिविल प्रोसीजर कोड की तरह इसका प्रोसीजर (तौर -तरीका) तय किया गया है.

इसको लेकर देश के 12 राज्यों में ‘भारत बंद’ नारे के तहत हिंसा फैल गयी. इसमें 14 लोग पुलिस की गोली या अन्य हिंसक वारदातों में मारे गये. सर्वाधिक 7 मौतें मध्यप्रदेश में हुईं. ऐसे वर्ग संघर्ष या जतिगत भावनाओं के आन्दोलन में तर्क कोई नहीं देखता केवल नारा व हल्ला मचता है.

इस समय सारे भारत में छोटी से छोटी जगह से लेकर नगरों व महानगरों तक ऐसे तत्व भारी संख्या में हो गये हैं जो कोई भी आंदोलन किसी भी बात पर हो, इन तत्वों का उससे तो कोई मतलब नहीं होता है तो भी वे उसमें पूरी ताकत से तोड़-फोड़ व लूटमार के लिये कूद पड़ते हैं और दुकानों घरों से जो भी हाथ लगता है उसे ले भागते हैं.

राजस्थान से जाटों ने उनके लिए आरक्षण का आंदोलन शुरू किया और वजह यह थी कि राजस्थान मीणा समुदाय को 5 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है तो उन्हें भी दिया जाए. जबकि आर्थिक दृष्टिï से जाट संपन्न और मीणा विपन्न (गरीब-पिछड़े लोग) हैं. यूपीए के शासन काल में जाटों ने एक माह तक दिल्ली-मुम्बई सेण्ट्रल रेलमार्ग को ठप्प कर दिया. सरकार खामोश बैठी रही.

सुप्रीम कोर्ट ने जब कार्यवाही करने को कहा तब सरकार तैयार हुई और जाट भी चुपचाप उठ गये. लेकिन जाटों का आंदोलन कुछ समय बाद जब हरियाणा से प्रारंभ हुआ तो कहा यह जाता है कि आंदोलनकारियों ने हिंसक होकर पूरा रोहतक शहर लूट और जला डाला. किसी को भी यह समझ में नहीं आया कि जाट आरक्षण मसले का रोहतक शहर से क्या लेना-देना था.

उसे क्यों और जलाया गया- इसका जवाब भी स्पष्ट है कि वे आंदोलनकारी थे ही नहीं बल्कि वे तत्व थे जो हर किसी आंदोलन में उसके समर्थक बन कूद जाते है और लूटमार व आगजनी करते हैं. उनका सिर्फ इसी काम से वास्ता रहता है. ऐसे लोग पार्टियों की रैलियों में घुसकर रेलों पर कब्जा कर उस भीड़ में भारी मात्रा में ड्रग, गांजा, अफीम आदि की भारी तस्करी कर लेते हैं.

इस दलित आंदोलन में ऐसे तत्व ही निश्चित रूप से सक्रिय रहे होंगे जिन्हें केवल लूट-मार, आगजनी ही करना है. मामला चाहे पद्मावती-पद्मावत फिल्म या सच्चा सौदा बाबा राम रहीम, हनीप्रीत का हो, ये पेशेवर लुटेरे हमेशा, रॉड, डंडे, घासलेट, पेट्रोल से हमेशा तैयार बैठे रहते है. कहीं भी कुछ भडक़ा और ये उनके हिमायती बन कर पहुंच जाते हैं.

बहुत कुछ हद तक सरकारें भी इसके लिये दोषी हैं. वे उसी समय किसी मसले पर सक्रिय होती हैं जब वह और जितना ज्यादा उग्र और हिंसक हो जाए. प्रश्न यह उठता है कि राजस्थान में मसला जाट आरक्षण का था और उसका रेल परिवहन से क्या वास्ता था. जाट एक महीने रेलवे ट्रेक पर तम्बू गाड़ कर बैठ गये वहां उनका खाने पीने का लंगर चलता रहा. उस समय यूपीए सरकार थी- वह खामोश बैठी रही. ऐसा लगा जैसे देश में कोई सरकार ही नहीं है.

पुलिस वालों की शिकायत जायज है कि गिरफ्तारी व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों की हो सकती है लेकिन भीड़ (माब) को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है. उस पर एक्शन बल प्रयोग ही करना पड़ता है. लेकिन बल प्रयोग पर यह आरोप लगता है कि पुलिस बर्बर हो गयी थी.

जब भीड़ लूटमार और आगजनी कर रही हो तो क्या उन्हें गिरफ्तार करना संभव होता है. अगर पुलिस गोली चलाये तो कहा जाता है कि पुलिस जरूरत से ज्यादा खुद हिंसक हो गयी और इसकी ज्युडीशियल इंक्वारी हो.

आज यह बड़ी घातक मानसिकता पनप रही है . सरकार कोई अलग चीज है- जनता अलग चीज है और पुलिस दमन का प्रतीक है. गांधी के देश में सत्याग्रह कभी के दुराग्रह बन चुके हैं और अहिंसा पर हिंसा राजनैतिक जीवनशैली बन गयी है.

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