आतंकियों की काली करतूत ने एक बार फिर सबकों हिलाकर रख दिया है. सेना पर सीमा पार से तो पाकिस्तान इन दिनों प्राय: हमले कर रहा है लेकिन सेना के परिवार वाली बसाहट में घुसकर इस तरह कायराना हरकत को अंजाम देना बड़ी चिंता का विषय है.

जम्मू के सुजवां स्थित सेना के केम्प में आवासीय परिसर में जहां परिवार भी रहते हैं, तडक़े सेना की वर्दी पहनकर घुसे लगभग तीन से चार आतंकवादियों ने एकाएक हमला किया. सोते हुए लोगों को बंधक बनाया गया. आतंकी अंधाधुंध फायरिंग करते हुए सेना के अफसरों के घर में भी घुसे. इस शिविर में सात सौ से ज्यादा लोग रहते हैं.

सेना ने तुरन्त जवाबी कार्रवाई शुरू की. ये आतंकवादी जैश-ए-मोहम्मद के बताए जा रहे हैं. तलाशी अभियान दूसरे दिन भी चल रहा है. सुरक्षा बलों ने चार आतंकवादियों को मार गिराया है. एक-दो आतंकियों के छिपे होने की आशंका भी व्यक्त की जा रही है.

इस आतंकी हमले में सेना के 5 जवान भी शहीद हो गये हैं. इनमें दो जेसीओ, तीन जवान और एक जवान के परिजन भी शामिल है. वर्ष 2016 में हुए उरी आतंकी हमले के बाद इस तरह का यह सबसे बड़ा आतंकी हमला है.

यह तय है कि इस तरह के आतंकी हमलों से बचने के लिये हमसे कहीं न कहीं हर वक्त चूक होती है, इसलिए अब हर संवेदनशील इस तरह के स्थानों पर और सतर्कता बरतने की जरूरत है. हमारी खुफिया सेवाओं को भी और मजबूत करना होगा. जैसा कि विदित है ही कि खुफिया सेवा ने यह आशंका जाहिर की थी कि आतंकी अफजल गुरु की पांचवी बरसी 9 फरवरी पर जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी बड़ा हमला कर सकते हैं.

खुफिया रिपोर्ट के बाद कश्मीर में तो कड़े सुरक्षा प्रबंध कर लिये गए थे लेकिन जम्मू में सुरक्षा व्यवस्था में चूक हो गई और अंतत: आतंकवादी अपने मंसूबे में कामयाब हो गये. यहां एक बिन्दु और गौर करने लायक है कि 15 वर्ष पहले भी इसी स्थान पर एक और आतंकी हमला किया जा चुका है. उस दिन भी शनिवार ही था और आतंकवादी इसी शैली में तडक़े ही घुसे थे. एक ही स्थान पर दूसरा हमला होना चिंताजनक है तथा अब हर स्थान के लिये और ज्यादा सतर्कता की अपेक्षा रखता है.

जम्मू और कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित हमले निरन्तर बढ़ रहे हैं. हम सर्जिकल स्ट्राइक भी कर चुके हैं तथा हमारी सेना भी समय-समय पर इस तरह के हमलों का मुंह तोड़ जवाब देती रही है. लेकिन हमलों पर रोक न लगना- इस बात का संकेत है कि रणनीतिक स्तर पर भी हमें कुछ और कदम उठाना होंगे.

जम्मू कश्मीर के नेताओं को भी चाहिए कि वे इधर-उधर बचते रहने के बजाय आतंकवाद के खिलाफ खुलकर सामने आएं फिर चाहे सामने पाकिस्तान, आतंकवादी संगठन, उनके प्रतिनिधि या फिर पत्थरबाज और आतंकवादियों के स्थानीय संरक्षणकर्ता ही क्यों न हों! यदि ये ऐसा नहीं करते हैं तो यह माना जाना चाहिए कि कश्मीर में आतंकवाद के लिए किसी न किसी रूप में वे भी
जिम्मेदार हैं!