सुप्रीम कोर्ट ने 18 जनवरी को यह फैसला दिया कि संजय लीला भंसाली की पीरियड फिल्म पूरे देश में रिलीज होगी और कोई भी राज्य सरकार इस पर किसी तरह का प्रतिबंध या रोक न लगाये.जिन राज्य सरकारों ने इस फिल्म पर सेंसर से पास होने से पहले ही उनके राज्य में रिलीज पर प्रतिबंध लगा दिया था, उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस देकर जवाब मांगा है.

इससे पहले कुछ लोगों ने इसे प्रतिबंधित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी उन याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि जब अभी फिल्म को सेंसर बोर्ड ने देखा नहीं, पास नहीं किया- तब किसी फिल्म पर प्रतिबंध करने की मांग कैसे की जा सकी है. इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने उन राज्य सरकारों से भी यह पूछा था कि जब अभी ऐसी कोई फिल्म है ही नहीं तो वे किस फिल्म को बेन कर रहे हैं.

बेन लगाने वाले राज्यों में मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, गुजरात, बिहार थे. ऐसा बेतुका प्रतिबंध राज्य सरकारों ने पहली बार ही किया. फिल्म उसी वक्त पूरी हो गई मानी जाती है जब उसे सेंसर को सर्टीफिकेट मिल जाता है. संसद ने काफी पहले फिल्म सेन्सर बोर्ड का नाम परिवर्तन कर उसे ‘बोर्ड आफ फिल्म सर्टीफिकेशन’ नाम दिया है.

सुप्रीम कोर्ट ने भी यही माना है कि फिल्म के मामले में सेंसर बोर्ड ही संसद के कानून से अधिकृत संस्था है. जबकि राजस्थान में करनी सेना नाम का संगठन की यह मांग थी कि वे ही वह फिल्म देखकर उसे पास करेगा.

इस तरह तो कोई भी संस्था एक आंदोलन खड़ा करके अपने लिये कोई भी अधिकार मांगने लगेगी. यह हिमाकत सबसे पहले दिल्ली में श्री अन्ना हजारे कर चुके हैं. उनकी मांग थी कि वे लोकपाल का विधेयक तैयार करेंगे. सरकार ने उन्हें सिर्फ यह कहा कि उनके सलाह मशविरा हो सकता है. विधेयक बनाना सरकार का काम है.

राजस्थान में इसी साल विधानसभा के चुनाव होंगे. उसी संदर्भ में राजपूतों की एक संस्था करनी सेना के कुछ लोगों ने अपनी राजनैतिक हैसियत बनाने के लिए एक फिल्म को लेकर उस समय आंदोलन खड़ा कर दिया जब फिल्म बनने की स्टेज में थी. राजस्थान में राजपूत काफी संख्या में हैं. इसलिए वे अपनी चुनावी हैसियत बनाना चाहते है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में राज्य सरकारों को यह सख्त निर्देश भी दिया है कि फिल्म प्रदर्शन को कोई राज्य सरकार रोक नहीं सकती और यह उसकी संवैधनिक जिम्मेवारी है कि वह फिल्म देखने वालों और उन टाकीजों को सुरक्षा प्रदान करें जहां फिल्म दिखाई जाये.

मध्यप्रदेश के गृहमंत्री श्री भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि वे फैसले का अध्ययन करने के बाद ही कुछ कह सकेंगे. हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री खट्टर ने कहा है कि वे इस फैसले के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में रिवीजन पिटीशन लगाएंगे. राजस्थान व गुजरात सरकारों ने कहा है कि पैसले का अध्ययन कर रहे हैं.

अब जातों के नाम पर कोई भी आन्दोलन खड़ा करने की प्रवृत्ति चल पड़ी है. जब पिछड़ी जाति मीणा को आरक्षण दिया गया तो जाट जो पिछड़ी जाति नहीं हैं- उसने भी जाट जाति के नाम पर आरक्षण मांगा.

गुजरात में पाटीदार भी पिछड़ी जात नहीं हैं, लेकिन वहां राज्य विधानसभा के चुनाव आ रहे थे तो कुछ लोग पाटीदार आरक्षण पर नेता बन गए. अब राजस्थान में चुनाव आ रहे तो वहां पद्मिनी को मुद्दा बनाकर कुछ लोग अपनी राजनैतिक हैसियत बना रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला संविधान व कानूनी व्यवस्था के साथ लोगों के मूलभूत अधिकारों की जीत और भीड़तंत्र की गुंडागिरी पर प्रहार है. देश में भाषा, जात व भावनाओं के आंदोलन राष्ट व समाज के विरुद्ध और घातक हैं. इन्हें सख्ती से इसी तरह दबाना होगा जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से
हो रहा है.

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