भारत और चीन के बीच न सिर्फ सीमा विवाद है बल्कि राजनैतिक व आर्थिक क्षेत्र में भी काफी प्रतिस्पर्धा चल रही है. चीन जहां प्रशांत महासागर में अपने प्रभुत्व बढ़ाने को आतुर है और उसे न सिर्फ प्रशांत के देशों जापान, दक्षिण कोरिया, फिलीपीन्स, मलेशिया, वियतनाम, ब्रुनेई से भारी रुकावट महसूस हो रही है बल्कि इस मामले भारत और अमेरिका दोनों ही उसके प्रभुत्व को जमने नहीं दे रहे है.

चीन प्रशांत महासागर क्षेत्र के बाहर भी समुद्रों में अपनी पैठ बढ़ाने में लगा है. हाल ही उसने अफ्रीकी बंदरगाह डिजबोती मेें आर्थिक मदद से एक बंदरगाह स्थापित किया है. श्रीलंका में हबंगटोला में बंदरगाह विकसित कर रहा है. जिसे भुगतान के बदले श्रीलंका से 90 साल की लीज पर ले लिया है.

कभी 19वीं सदी में ब्रिटेन ने भी चीन से हांगकांग 100 साल की लीज पर दिया था. इसके अलावा उसने चीन से सडक़ मार्ग का पाकिस्तान के ग्वादर तक एक आर्थिक गलियारा बना लिया है और ग्वादर को बन्दरगाह के रूप में विकसित कर रहा है. उसने एक बांध भी पाकिस्तान में बनाना चाहा और उस पर मालिकाना हक मांगा है. चीन के इन कदमों से श्रीलंका व पाकिस्तान में चिंता व्याप्त हो गयी है कि वह आर्थिक मदद देकर उन राष्ट्रों पर काबिज होना चाहता है.

भारत में तिब्बती नेता दलाईलामा व तिब्बतियों का शरणार्थी के रूप में स्थाई तौर पर रहना उसे उसके तिब्बत क्षेत्र में भारत का दखल लगता है. इसलिये वह भारत के विरुद्ध सीमा विवाद और अरुणांचल पर दावेदारी बता रहा है. डोकलाम पर कब्जा करके वह भूटान में अपनी पकड़ व प्रभुत्व बनाना चाहता था. लेकिन भारत की चुनौतीपूर्ण नीति ने उसे हटने को विवश कर दिया.

इसी कारण वह मालदीव की वर्तमान में राजनैतिक अस्थिरता में अपना प्रभाव तो जमाना चाहता है लेकिन डोकलाम के अनुभव की वजह से वह वहां आ नहीं रहा है. केवल भारत से यह कह रहा है कि वह वहां सैनिक हस्तक्षेप न करे.

ऐसी ही तनातनी के साथ-साथ चीन अब चाहता है कि उसका भारत से सीधा टकराव न हो और दोनों के बीच संतुलन बना रहे. अमेरिका व अन्य सभी देश जो चीन कीे दखलंदाजी को नापसंद करते है वो यह मानते हैं कि चीन को एशिया में छा जाने से केवल भारत ही रोक सकता है.

डोकलाम के बाद पहली बार भारत के विदेश सचिव श्री विजय गोखले चीन गये और दोनों देशों के बीच सभी मुद्दों पर वार्ता हुई. चीन के विदेश मंत्री से भी मिले. आगामी जून में प्रधानमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी भी चीन वहां शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन में भाग लेने जा रहे हैं. श्री गोखले की चीन यात्रा इस संदर्भ में भी की गयी है. चीन के भारत के साथ व्यापारिक संबंध भी काफी बड़े हैं.

भारत इस दिशा में इस बात में संतुलन चाहता है कि दोनों देशों के आयात निर्यात में बहुत ज्यादा अंतर नहीं रहना चाहिए जिससे बैलेंस ऑफट्रेड बिगडऩे से भुगतान की समस्या भी पैदा हो. अभी चीन का भारत से आयात कम और वहां से निर्यात ज्यादा है. इसकी एक वजह यह है कि चीन यहां छोटी- छोटी चीजों, बच्चों के खिलौने, रेनकोट, टार्च, चम्मच छुरी, बालपिन जैसे माल को खपा रहा है.

भारत यह चाहता है कि दोनों देशों के बीच व्यापार कपास, इलेक्ट्रॉनिक व बड़े सामानों तक सीमित रहे. भारत और वियतनाम की बढ़ती निकटता भी चीन को उसके विरुद्ध लग रही है. अब दोनों देशों के बीच वार्ता का माहौल बन रहा है और चीन इसके लिये प्रयत्नशील है. वह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे में भी भारत को वन बेल्ट वन रोड स्कीम के तहत जोडऩा चाहता है- जिसे भारत नामंजूर कर चुका है. दोनों देशों में वार्ता में संतुलन बनाये जाने के प्रयास आगे बढ़ सकते हैं.

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