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भोपाल,

उपराष्ट्रपति वैंकैया नायडू ने कहा कि देशभर में संचालित पाठ्यक्रम भारतीय भाषाओं में होने चाहिए. यह असंभव नहीं है. प्रयास करेंगे तो संभव होगा. भाषा और भावनाएं साथ-साथ चलती हैं. मातृभाषा में ही अपनी भावनाएं अच्छे से अभिव्यक्त होती हैं.

दूसरी भाषाएं सीखने से दिक्कत नहीं है, लेकिन मातृभाषा पहले सीखनी चाहिए. मातृभाषा आंख है और दूसरी भाषा चश्मा है. यदि आंख ही नहीं होगी तो चश्मे का कोई उपयोग नहीं है. उपराष्ट्रपति नायडू माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्व विद्यालय के तृतीय दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे.

उपराष्ट्रपति नायडू ने अपनी विदेश यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि लैटिन अमेरिका के देश में लोग अपनी मूलभाषा भूल गए हैं, उसकी जगह स्पेनिश आ गई है. भारत में भी अंग्रेजों ने इस प्रकार का प्रयास किया, किंतु महान शक्ति के कारण हमारी भाषाएं बच गईं. अभी खतरा बरकरार है.

यदि हमने आने वाली पीढ़ी को मातृभाषा से नहीं जोड़ा तो दिक्कत होगी. हमें घर में बच्चों से मातृभाषा में बात करनी चाहिए.शिक्षा में मातृभाषा को अनिवार्य करना चाहिए. हमें गंभीरता से अपनी भाषाओं में शिक्षा देने की नीति बनानी चाहिए.

उपराष्ट्रपति नायडू ने कहा कि संसद में अच्छे काम होते हैं, लेकिन हंगामा मीडिया में महत्व प्राप्त करता है. आवश्यकता है कि मीडिया अच्छे कार्य को महत्व दे. जो सांसद अध्ययन कर प्रश्न पूछते हैं और जो मंत्री उनका अच्छे से जवाब देते हैं, उनको समाचार में प्रमुखता से स्थान देने की आवश्यकता है.

उन्होंने बताया कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए सदन का चलना आवश्यक है. चार सी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कास्ट, कम्युनिटी, कैश और क्रिमिनलिटी यदि राजनीति में प्रभावी होगी तो लोकतंत्र कमजोर होगा. इसलिए दूसरी चार सी . कैरेक्टर, कैपेसिटी, कलीबर और कन्डक्ट पर ध्यान देना होगा.

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