यूनियन कार्बाइड के विरुद्ध भोपाल गैस पीडि़तों के मामले शुरू से ही कानूनी पचड़े में ही ज्यादा उलझते रहे हैं और यह सिलसिला अभी जारी है.

इस समय सर्वोच्च न्यायालय में भारत सरकार की ओर से यूनियन कार्बाइड और उसको खरीद लेने वाली कम्पनी ”डाऊ” के विरुद्ध यह मामला चल रहा है कि कार्बाइड-डाऊ भोपाल गैस त्रासदी भुक्तभोगियों के लिए 7,844 करोड़ रुपयों का अतिरिक्त भुगतान करे. इससे पूर्व आपसी समझौते में सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में 470 मिलियन अमेरिकी डालर का भुगतान कार्बाइड गैस पीडि़तों के लिए भारत सरकार को संपूर्ण एवं अंतिम भुगतान के रूप में कर चुकी है. जब डाऊ ने कार्बाइड को खरीदा उस समय के पूर्व ही यह भुगतान हो चुका था. इसलिए देनदारी के रूप में यह अतिरिक्त भुगतान डाऊ पर नहीं बनता है. साथ ही उसका यह कहना है कि डाऊ का कोई काम या उपस्थिति भारत में नहीं है इसलिए वह भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं है.

सन् 1984 में घटी इस विपदा पर भारत सरकार ने सभी गैस पीडि़तों की तरफ से अमेरिकी अदालत में कार्बाइड के विरुद्ध मुकदमा लगाया था जिसे इस आधार पर नहीं माना गया कि घटना भारत में हुई है और कार्बाइड वहां मौजूद है. इसके बाद ही सर्वोच्च न्यायालय में मामला चला था और 470 मिलियन अमेरिकी डालर पर समझौता हुआ. लेकिन इस कानूनी दांवपेंच का भी भोपाल के गैस पीडि़तों पर कोई प्रभाव नहीं पडऩा चाहिए. पिछले करार में यह भी शामिल है कि उक्त मुआवजा के बाद यदि गैस पीडि़तों के हक में कोई देनदारी निकलती है तो वह रकम भारत सरकार देगी. ऐसे में सरकार ने इस समय जो दावा 7.844 करोड़ रुपयों का लगाया है उससे एक बात स्थापित हो गई है कि सरकार यह मानती है कि गैस पीडि़तों को इतना मुआवजा और मिलना चाहिए. इसलिए केंद्र सरकार को यह रकम स्वयं अतिरिक्त गैस मुआवजा के लिये जारी व वितरित करनी चाहिए. यदि वह मामला सर्वोच्च न्यायालय में जीतती है तो वह उस रकम को अपने बजट में वापस ले सकती है. यदि हारती है तब भी पिछले करार के अनुसार उस पर किसी अतिरिक्त भुगतान की जिम्मेदारी है जो स्वयं उसने करार की शर्तों में रखा है. केंद्र पर यह दायित्व कानूनी बाध्यता है.

गैस पीडि़त संगठनों को इस मामले पर भोपाल में उग्र और हिंसक प्रदर्शन करने के बजाय इस कानूनी पक्ष पर सुप्रीम कोर्ट में जाना चाहिए. कुछ संगठन इस बात की मांग कर रहे कि भोपाल गैस त्रासदी के कारण ‘डाऊ’ कंपनी को 2012 में लंदन ओलंपिक खेलों का प्रयोजक न बनाया जाए. इस तरह की मांग गैर संजीदा और अनुचित है. इसे माना नहीं जायेगा. ऐसी भावनात्मक मांगों से हासिल तो कुछ होना नहीं है. उल्टे ये संगठन गैर जिम्मेदाराना हरकत के दोषी ही बनेंगे.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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