कुछ ही वर्ष पूर्व राजधानी भोपाल में निर्माणों से नाले बन्द हो जाने के कारण शहर में भारी बाढ़ आ गई थी. उस संकट में शासन ने लोगों की राहत के लिये मुफ्त में राशन उपलब्ध कराया. इस महान कार्य में राशन सप्लाई करने वाले ठेकेदारों व कर्मचारियों ने भारी नीचता कर डाली.

खाद्यान्न के बोरों में मिट्टी के बड़े-बड़े ढेले भर कर सप्लाई किया. मामला पकड़े जाने पर कई बड़े गोदाम वाले इस कार्य में लिप्त पाये गये और उनके गोदामों की जब्ती की गई.

लेकिन यह नीचता का कार्यक्रम राशन की दुकानों पर पूरे राज्य भर में धड़ल्ले से चल रहे हैं. जो अत्यन्त गरीब वर्ग यहां से राशन लेता है उसे तो शासन भारी सबसिडी देेकर 2 रुपये किलो गेहूं और 3 रुपये किलो चावल देती है.

घासलेट-शक्कर पर भी भारी सबसिडी दी जा रही है. लेकिन सभी स्तर पर शासकीय स्टाफ व राशन की दुकान चलाने वाले इन खाद्यान्नों में भारी कचरा मिलाकर उसे बेचकर काली कमाई व भ्रष्टाचार कर रहे हैं.कहने को तो इन्हें उचित मूल्य की दुकान भी कहा जाता है लेकिन ये वास्तव में बहुत ही अनुचित मूल्य की दुकानें हो गयी हैं जहां कचरा बेचा जा रहा है. सरकार गरीबों को भारी सबसिडी दे रही है और उन्हें वास्तव में कचरा मिल रहा है.

सरकार को सतत् मुहिम चलाकर इस निर्धन वर्ग का शोषण और स्टाफ का भ्रष्टाचार रोकना चाहिए. मंत्रियों के दौरे राज्य भर में चलते रहते हैं उन्हें हर दौरे में हर जगह इन राशन की दुकानों का लगातार निरीक्षण करते रहना चाहिए.

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