सृजनात्मक विमर्श

भोपाल,साहित्य अकादमी संस्कृति परिषद द्वारा प्रदेश की साहित्यिक संस्थाओं के प्रमुखों के साथ दो दिवसीय ‘सृजनात्मक विमर्श’  का आयोजन राज्य संग्रहालय में आयोजित हुआ.

दो दिवसीय इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य प्रदेश की क्रियाशील साहित्यिक संस्थाओं और साहित्य अकादमी के बीच परस्पर साहित्यिक सृजनात्मक विमर्श स्थापित करना और साथ ही कई गंभीर विषयों पर चिंतन करना था.

कार्यक्रम का प्रारंभ वन्दना के साथ हुआ, मुख्य अतिथि साहित्यकार डॉ. पी. के. सुब्रमणियम के साथ अध्यक्ष शिक्षाविद व साहित्यकार श्रीधर पराड़कर ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया. निर्देशक साहित्य अकादमी व कार्यक्रम संयोजक डॉ. उमेष कुमार सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया.

प्रथम सत्र में ‘भारत की ज्ञान परंपरा और वर्तमान परिदृश्य पर व्यापक चर्चा हुई. डॉ. उमेष कुमार सिंह ने इस विषय पर प्रकाश डालते हुए बताया कि भारत की ज्ञान परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है जिसको सम्पूर्ण दुनिया प्रमुख स्थान देती है, आपने वेद तथा लोक के महत्त्व पर वृहद चर्चा करते हुए कहा कि लोक के गर्भ में ही वेद का ज्ञान है, संतों ने ज्ञान परम्परा को आगे बढ़ाया है.और साहित्य अकादमी प्रदेश भर में प्रमुख पांच संतों तथा तीन ऋषियों पर लगातार कार्यक्रम आयोजित कर एक चेतना जाग्रत कर रही है.

द्वितीय सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार, चिंतक कैलाष चन्द पंत ने की. इस सत्र का विषय च्भारतीय साहित्य में आयातित एवं भारतीय चिंतनज् कार्यक्रम में डॉ. हरिसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय सागर के कुलपति बलवंत सिंह जानी उपस्थित रहे. मध्यप्रदेश की संस्था प्रमुखों ने इस विषय में भागीदारी की साथ ही शहर के कई साहित्यकार, विद्वान जन भी उपस्थित रहे.

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