भारतीय संस्कृति में समाजसेवा के लिए कई प्रकार के दान को बेहतर जरिया माना गया है, इसमें भी शिक्षा दान को सबसे ज्यादा वरीयता दी गई है। अब परिवेश बदल रहा है और इस बदलते परिवेश में भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति का लेप चढ़ रहा है, जिससे शिक्षा भी सामाजिक प्रदूषण का शिकार हो रही है।

यूं तो शिक्षा सरकार और समाज की संयुक्त जिम्मेदारी है, लेकिन बीते सालों में शिक्षा नीति में हुए बदलावों के चलते यह निजीकरण की दिशा में आगे बढ़ रही है।जाहिर है कि व्यवसाय करने की नीयत से बाजार में कदम रखने वाले निजी स्कूल शिक्षा के जरिए सेवा तो कतई नहीं करना चाहते हैं।

तो फिर शिक्षा में सेवा की अनुभूति कैसे हो सकती है? प्राचीन काल में कथा-पुराणों का श्रवण-कथन एक धर्मकृत्य माना जाता था। अब उसे नैतिक शिक्षा, मनोविज्ञान एवं विनोद का सम्मिलित स्वरूप मान कर अपनाया जा सकता है।

शिक्षा अर्थात अध्यापन से धन और अधिकार के अलावा कुछ और भी मिलता है और वह है प्यार। यह वह प्यार है जो एक अध्यापक को अपने छात्र से होता है, जो उसके जीवन में कच्ची मिट्टी की तरह आता है और नए-नए रूप धरने लगता है।

किसी शिक्षक और समाज को यह अनुभूति तभी हो सकती है, जब वह शिक्षा को दान की तरह समाज में बांट देता है। कहते हैं दान कुछ पाने की इच्छा से नहीं किया जाता है। दान में सेवा भावना होना चाहिए। इसी प्रकार शिक्षा तभी तक सार्थक हो सकती है, जब तक कि उसके क्रियान्वयन में सेवा भावना हो।

जिस ज्ञान को तर्क, तथ्य और प्रमाण के जरिए श्रेष्ठ माना गया है, उसे क्रियान्वित करते रहने की व्यवस्था भी की जाए। अन्यथा जो सीखा गया है, वह मानसिक भार बनकर रह जाएगा। जिस तरह ज्ञान के अभाव में मनुष्य अंधा और कर्म के अभाव में नंगा होता है, उसी तरह यथार्थ में सेवा के बिना शिक्षा का कोई मोल नहीं है। ‘विद्या ददाति विनयम’ का यह सूत्र वाक्य इस बात की ओर इंगित करता है कि शिक्षा से ही दया, उदारता, करुणा और सेवा की भावना विकसित होती है।

शिक्षा में सेवा हो तो समाज में वह संजीवनी विद्या का रूप ले सकती है। कुछ उत्साही एवं सेवाभावी लोग शिक्षा दान के अभियान में आगे आकर इसे गति दे सकते हैं और ऐसे अभियान गति पकड़ ले तो उनके दूरगामी परिणाम आ सकते हैं।

इसके लिए गांव, मोहल्लों में बाल विकास केंद्र, व्यायामशालाएं खोली जा सकती है, जिनमें दंड बैठक के घिसे-पिटे कार्यक्रमों के अलावा आहार विज्ञान, स्वच्छता, स्वास्थ्य रक्षा, शिष्टाचार और खेलकूद की तरह अन्य विद्याओं का ज्ञान समेटा जा सकता है। सेवा भावना से किया गया शिक्षा का यह दान अनमोल होगा।