भारतीय संविधान में संवैधानिक प्रमुख भारत के राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने राज्यपालों के 46वें सम्मेलन में देश को संविधान की मर्यादा लांघने के खतरे के विरुद्ध चेताया है. इससे प्रजातंत्र के अवमूल्यन के साथ ही लोगों के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक हितों का उल्लंघन हो जायेगा. शासक वर्ग पर संविधान की शक्तियों से देश में शांति, धार्मिक सद्भाव और व्यवस्था को बनाये रखने का दायित्व है. हर नागरिक संविधान की तरफ स्वाधीनता और समानता के अधिकारों के लिये देखता है.

आर्थिक परिवेश के संदर्भ में राष्ट्रपति ने आगाह किया है कि 2025 तक देश में संसार भर में सबसे ज्यादा रोजगार चाहने वाले होंगे. उस समय दुनिया में 56.5 मिलियन कुशल लोगों की जरूरत होगी और 47 मिलियन रोजगार के लिये तैयार होंगे. यदि इन सभी को काम दिया गया तो प्रगति चौमुखी हो जायेगी अन्यथा सामाजिक असंतोष ही पनपेगा.

जबसे देश में एकछत्र राज्य करने वाली कांग्रेस की राजनैतिक अवनति हुई है और केन्द्र व राज्यों में साझा सरकार का दौर शुरु हुआ है उसमें राज्यपालों की संवैधानिक भूमिका प्रमुख हो गई है. प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री पदों के लिए परस्पर विरोधी दावों में राज्यपाल को उन दावों का निराकरण करना भी उनका संवैधानिक दायित्व होता है. केन्द्र में भी सन् 70 के दशक में जनता पार्टी की मोरारजी देसाई की सरकार के पतन के समय श्री देसाई- श्री चरण सिंह व श्री जगजीवन राम प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में परस्पर विरोधी उम्मीदवार थे. यह सिलसिला चल ही रहा है. अभी बिहार में बहुमत का नेता कौन- नीतिश या मांझी- इसका फैसला राज्यपाल को करना है.
राज्यपालों के सम्मेलनों को अब तक स्वयं कभी का यह तय कर लेना था कि ऐसी स्थिति में कौन सी प्रक्रिया अपनायी जानी चाहिये. बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट को ही राज्यपालों को यह निर्देश देना पड़ा कि वे ऐसा फैसला विधानसभा की परिधि में ही करें. यह निर्देश ही यह साबित कर गया कि राज्यपाल स्वयं ही संवैधानिक अर्थों या दायित्व को ही सही तरीके से इस्तेमाल न कर पाये. यदि संवैधानिक पदाधिकारियों को ही दिशा-निर्देश देने पड़े तो यह भी सिद्ध होता है कि उस पद पर ऐसे व्यक्ति नियुक्ति कर दिये गये जो उस योग्य नहीं थे और संविधान के पूर्ण रूप से अवगत नहीं थे.

ऐसा ही कुछ राज्य विधानसभा में स्पीकरों द्वारा भी होता है. दल-बदल कानून के तहत उन्हें किसी सांसद या विधायक की सदस्यता रद्द करने का अधिकार है. इसमें भी ऐसे उदाहरण सामने आये हैं कि भिन्न-भिन्न राज्यों में स्पीकरों ने अलग-अलग प्रक्रियायें व मानदंड अपनायें जबकि राज्यपालों की तरह संसद व विधानसभा अध्यक्षों के सम्मेलन होते हैं और उनमें यह तय हो जाना चाहिए कि दलबदल की परिस्थितियों में क्या प्रक्रिया या नीति अपनायी जाए. अभी राज्यों में अलग-अलग तरीके अपनाना भी संविधान की मर्यादा का उल्लंघन है. संविधान की मर्यादा व शक्ति उसकी प्रभावी एकरूपता में है.

Related Posts: