अकाल के बारे में तो नहीं लेकिन सूखे के बारे में यह कहा जाता है कि यह भी प्रकृति की हितकारी व्यवस्था है. यह स्थिति कभी-कभी लंबे अंतराल के बाद एक साल होती है. इसमें खेतों से खाली रहने व तेज गर्मी पडऩे में जमीन में प्राकृतिक उर्वरा शक्ति में भारी इजाफा हो जाता है जो कई सालों तक अच्छी फसल देता है.

वैसे भी किसान स्वयं कई बार अपने खेतों को खाली छोड़ देते हैं और उर्वरा शक्ति बढ़ाते है. ऐसे ही मौसम में तालाबों में पानी कम होने से किनारों पर सूखी जमीन निकल आयी है. कृषक ज्ञान यह कहता है कि इस समय इन जगह से मिट्टी (गाद) को निकालकर कई तालाब को गहरा कर लेना चाहिए. इनसे दो फायदे होते है कि यह निकाली गयी मिटटी में बहुत उवर्रा शक्ति की होती है. जिसे बंजर जमीनों में डालकर उन्हें भी उर्वरक बनाया जाता है और तालाबों में भी जलग्रहण क्षमता बढ़ जाती है. लेकिन ऐसा लगता है कि प्राचीन समय से चला आ रहा यह कृषक ज्ञान शासन व लोगों ने भुला दिया है. इस बार न सिर्फ राजधानी भोपाल बल्कि पूरे प्रदेश के तालाब काफी पीछे सरक गये हैं वहां से इसी समय फौरी तौर पर मिटटी निकालने का काम होना चाहिए.

कुछ समय पूर्व भोपाल के बड़े तालाब में मिटटी निकालने का काम तो शुरू किया गया था- लेकिन वह फोटो सेशन बन के रह गया. लोगों ने हाथ में मिटटी भरी तगाड़ी उठाकर फोटो खिंचाई और चल दिये. अब सरकार को वास्तविक रूप से इस समय तालाबों को गहरा करा लेना चाहिए.

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