भारत सहित सारी दुनिया में अंतरराज्यीय और अंतराष्ट्रीय नदियों के जल विवाद की एक ही थीम होती है कि ‘‘हमारे हिस्से का पानी’’. भारत में कर्नाटक और तमिलनाडु का कावेरी नदी विवाद की भी यही थीम है और पिछले 137 सालों से यह विवाद चला आ रहा है.

भारत की आजादी के बाद से यह दो राज्यों का अन्तरराज्यीय (इंटर स्टेट) विवाद हो गया और केन्द्र सरकार का सिरदर्द बन गया. केन्द्र सरकार के स्तर पर ट्रिब्यूनलों और अदालतों के माध्यम से यह मामला झगड़े में ही चलता रहा. हर फैसले में एक न एक पक्ष असंतुष्ट बना रहता और विवाद भी जैसा का तैसा बना रहता.

इस मामले में ट्रिब्यूनल ने एक फैसले से जल बंटवारा कर दिया. इस ट्रिब्यूनल को केन्द्र सरकार ने जून 1990 में बनाया था और इसने 17 साल तक इसकी लम्बी सुनवाई की और 2007 में जल बंटवारा फैसला सुना तो दिया पर तीनों संबंधित राज्य सरकारों तमिलनाडु, कर्नाटक व केरल ने इससे असंतुष्ट होकर इसके विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी.

अब 2018 में 16 फरवरी को ट्रिब्यूनल के जल बंटवारे में संशोधन करते हुए नये सिरे से बंटवारा कर दिया. इसमें तमिलनाडु का जल भाग कम और कर्नाटक का जल भाग बढ़ाया गया है और केरल व पुडुचेरी का हिस्सा जस का तस रखा. फैसला होते ही जैसा हमेशा होता चला आ रहा है वैसा ही इस बार सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर होने के संकेत दिये जा रहे हैं.

तमिलनाडु का हिस्सा कम किया गया है इसलिये वह सुप्रीम कोर्ट में ही उसके फैसले के खिलाफ रिव्यू पिटीशन लगाने की सोच रहा है. यदि यह हुआ तो फैसला एक और कानूनी प्रक्रिया से गुजरेगा. कावेरी विवाद का सबसे दुखद पहलू यह रहा है कि समय-समय पर जो भी फैसले हुए उसके प्रतिरोध में प्रतिशोध में दोनों राज्यों कर्नाटक व तमिलनाडु के लोगों में क्षेत्रीयता की ऐसी कटुता और हिंसा होने लगती है जैसे वह दो राष्ट्रों का विवाद व युद्ध है.

इस बार सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है उसमें सबसे पहले यह राष्ट्रीय भावना व्यक्त की है कि नदियां राष्ट्र की संपत्ति हैं और इन पर कोई एक राज्य का मालिकाना या भौगोलिक हक नहीं माना जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में एक बड़ा निर्देश यह दिया है कि अब यह विवाद 2 या 4 राज्यों का विवाद नहीं है. यह सुप्रीम कोर्ट का राष्ट्रीय फैसला है और इसे लागू करने की जिम्मेवारी केन्द्र सरकार की होगी और यह फैसला अब 15 साल तक लागू रहेगा- उसके बाद इस पर अनुभवों के आधार पर पुनर्विचार करने का सोचा जा सकता है.

अब स्थिति यह हो गयी है कि यदि कर्नाटक व तमिलनाडु में पुन: हिंसा भडक़ने व क्षेत्रीय कटुता या अन्य किसी कारण से यह फैसला लागू नहीं होता है तो वह केन्द्र सरकार के विरुद्ध अवमानना का प्रश्न बन जायेगा.

कावेरी नदी का उद्गम तो कर्नाटक राज्य में है लेकिन इसका जलग्रहण क्षेत्र (बेसिन-केचमेंट एरिया) कर्नाटक में 32,000 और तमिलनाडु में 44,000 वर्ग किलोमीटर है. तमिलनाडु में धान की खेती कावेरी के पानी पर ही आश्रित रहती है.

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