तो जनाब इन्तजार की घडिय़ां खत्म हुईं, इंदौर शहर की पुलिस, प्रशासन, न्यायपालिका और आम जनता के अथक प्रयासों ने शनिवार 12 मई 2018 को यह साबित कर दिया कि हैवानियत को भी शिकस्त दी जा सकती है.

हैवान नवीन गडक़े, चार माह की बच्ची से बलात्कार के आरोपी की गर्दन के लिए 23 दिन के अंदर सशक्त रस्सी का फंदा बनाया जाना असंभव नहीं पर दुष्कर तो था. लेकिन इंदौर ने यह कर दिखाया. इंदौर के इस जज्बे को सलाम. आप भी अब तालियां बजाएं अपने उन दोनों हाथों से जो हैवान के लिये फांसी का फन्दा बनाने में लगातार रस्सी को बल देते रहे.

अद्भुत वाक्या था, प्रकरण में 29 गवाहों के साक्ष्य होने थे. सभी के साक्ष्य हुए, एक भी गैर हाजिर नहीं हुआ. पुलिस ने 7 दिन में चालान भी पेश कर दिया. 3 मई से 10 मई तक निरन्तर न्यायालय में ट्रायल चलती रही और 12 मई शनिवार को न्यायालय ने आरोपी के लिये फांसी की सजा घोषित कर दी.

यद्यपि अपराधी नवीन गडक़े तो मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा पर हम उस 4 माह की मासूम बच्ची को वास्तविक न्याय शायद कभी नहीं दे पाएंगे. उस अबोध बच्ची की दुरुह पीड़ा को अगर कम करना हो तो आरोपी को दस बार फांसी दिया जाना भी कम पड़ जाएगा. लेकिन लाशों को कौन फांसी देता है? हाँ यह सच है जिस समाज में, मुल्क में लाशों को फांसी पर टांग देने का जुनून हो, वहां हैवान और हैवानियत दोनों ही हाशिए पर चले जाते हैं.

इंदौर शहर का काबिले तारीफ जुनून तथा यह फैसला एक दिन हैवानों को हाशिए से भी बाहर कर देगा. तब हमें फिर किसी हैवान की मोटी गर्दन के लिये रस्सी नहीं बटनी पड़ेगी. सभी दुधमुंही बच्चियां सकुशल अपना पूरा जीवन जी सकेंगी. यकीन है इंदौर ऐसा कर सकेगा, और समाज उस दिन की प्रतीक्षा में है.

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