देश की राजधानी दिल्ली के 100 वर्ष (सन्ï 1911-2011) की शताब्दी चल रही है. साथ ही दिल्ली के ऐतिहासिक पुरातात्विक महत्व के अवशेषों की दुर्दशा दुखद है.

उल्लेखनीय है कि सन्ï 1911 में ब्रिटिश भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्ली लाई गई. ब्रिटेन के सम्राट का शाही दरबार उत्तरी दिल्ली में लगा. उसके बाद दिल्ली की चार दीवारी के बाहर नई दिल्ली में कनाट प्लेस, लुटियन दिल्ली, इंडिया गेट, रायसिना पहाड़ी पर साउथ ब्लाक, वर्तमान राष्टï्रपति भवन, वर्तमान संसद का भव्य निर्माण हुआ. सन्ï 1911-2011 के 100 वर्षों में देश की राजधानी का रूपाकार बहुत फैला है. लुटियन दिल्ली में राजपथ पर स्वतंत्रता सेनानियों के प्रचंड आंदोलन के कारण इंडिया गेट के सामने छतरी से ब्रिटेन के बादशाह की मूर्ति को हटाया गया और सौ वर्ष पहले के शाही दरबार (किंग्सवे कैंप के पास) स्थल पर रखा गया.

केंद्रीय राजधानी में चांदनी चौक में लार्ड हार्डिग की शाही सवारी पर बम फेंकने के आरोप में भाई अमीर चंद, बाल मुकुन्द आदि को पुरानी जेल (वर्तमान मौलाना आजाद आयुर्विज्ञान महाविद्यालय परिसर) में ‘फांसी दी गई. लाला हनुवंत सहाय को काले पानी (अंडमान निकोबार जेल) की सजा हुई. स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी देने का स्थल और पुरानी दिल्ली में स्वतंत्रता के महान योद्घा हनुवंत सहाय की हवेली उपेक्षित है. इसी के समीप सन्ï 1857 में स्वतंत्रता संग्राम के महानायक बहादुर शाह जफय के शहजादों के सिर ब्रितानी सेना ने निर्ममता पूर्वक काटे. तभी से चारदीवारी के बाहर इस दरवाजे का नाम ‘खूनी दरवाजा हुआ. तुर्कमान दरवाजे से आगे चलकर ही दिल्ली की ‘प्रथम महिला सुलतान रजिया सुलतान की कब्र है. यहीं आगे चलकर भक्तिकाल के संत चरणदास की सृजन स्थली है. संत चरणदास की मेधावी शिष्य संत कवि सहजोबाई ने हृदय को छूने वाले भजनों की भी रचना की.

महान शायर गालिब की हवेली की अवश्य साज सम्हाल की गई है. विश्व प्रसिद्घ काल किले में दिल्ली के सुलतान शेरशाह सूरी और उनके हिन्दू उत्तराधिकारी हेमू का विवरण सलीमगढ़ में कहीं नहीं मिलता है. सम्राट हेमू ने बादशाह हुमायू को हराया था. दिल्ली के बारहवीं शती में हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान और महारानी संयोगिता के महल के अवशेष इंद्रप्रस्थ में ढूंढे नहीं मिलते हैं. यह आश्चर्य की बात है कि मात्र 900 वर्षों में सम्राट पृथ्वीराज चौहान के महल जमीदोज कैसे हुए? महरौली के नजदीक पृथ्वीराज चौहान के किले रायपिथोरा की दीवारें अवश्य हैं. विश्व प्रसिद्घ कुतुब मीनार प्रांगण में विशाल लौह स्तंभ हजार वर्षों से बिना जंग लगे सिर उठाये खड़ा है. लौह स्तंभ पर उत्कीर्ण अक्षरों का भाषानुवाद करने में भाषाविद लगे हैं. प्राचीन भारत के विशेषज्ञों के अनुसार लौह स्तंभ पर वैदिक काल से पहले की लिपि में संदेश लिखा है. कुछ इतिहासकारों के अनुसार महारानी संयोगिता और राजकुमारी बेला का सती स्थल पांच कुओं के पास है.

हिन्दी के भक्ति कवि और अकबर बादशाह के नौ रत्नों में से एक अब्दुल रहीम खानखाना- कवि रहीमजी की मजार ने लगातार स्थान बदला. कवि रहीम जी के पिता बहराम खान बादशाह हुमायूं के सेनापति थे. कवि रहीमजी महान योद्घा भी थे. मथुरा मार्ग पर दिल्ली का पुराना किला और भैरव मंदिर का संबंध महाभारत कालीन पांडवों से है. नई दिल्ली में चाणक्य पुरी से लगे विनय मार्ग पर पांडव कालीन बटुक भैरव आदि के प्राचीन मंदिर हैं. नाथ संप्रदाय के संतों के अनुसार दिल्ली बाबा गोरखनाथ पंथियों का केंद्र रहा है. महोबा के अद्वितीय योद्घा आल्हा भी नाथ साधु के चेले थे. आल्हा, उदल का संबंध सम्राट पृथ्वीराज चौहान से रहा. दिल्ली के लाल किले में बौद्घ कालीन प्रस्तर स्तंभ भी सैंकड़ों वर्षों से स्थापित हैं.

इतिहासकारों के अनुसार ब्रितानी शासन में देश के सम्राटों, बादशाहों के अनेक महलों, हवेलियों आदि को बिना समझे बूझे तहश-नहश किया गया. समझा जाता है कि कनाट प्लेस में ट्रोपीकल इन्स्यूरेन्स बिल्डिंग, आजाद हिन्द फौज (आई.एन.ए.) के सर्वोच्च सेनापति एवं राष्टï्रपति नेताजी सुभाषचंद्र बोस के सहयोगियों का केंद्र रहा. जहां वर्तमान में सरकारी पत्र सूचना कार्यालय (पी.आई.बी.) का सूचना केंद्र था.  आखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी संघ के महासचिव रहे दलजीत सेन अदल के अनुसार नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सहयोगी आर.आर. तिवारी उन्हें (नेताजी को) अफगानिस्तान जाते हुये रुपयों का बोरा सौंपना चाहते थे.

दलजीत सेन अदल आदि ने सन्ï 1954 में पुरानी जेल में देश के क्रांतिकारी योद्घाओं का पहला और अंतिम सम्मेलन किया. अदल के अनुसार सम्मेलन में निर्वासन में सरकार गठित करने वाले राजा महेंद्र प्रताप, क्रांतिकारी कल्पनासेन, अनुशीलन पार्टी एवं रिवोलूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के जोगेश चटर्जी, कामागाटा मारू जहाज के बाबा सोहन सिंह भकना, लाला हनुवंत सहाय, महिर्षी अरविंद के भाई, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के भतीजे सहित 300 क्रांतिकारियों ने भाग लिया.

जयपुर के राजा सवाई जयसिंह द्वारा जंतर-मंतर (प्राचीन वेधशाला) अढ़ाई शती से अधिक से चुंबीय आकर्षण बनाये रखने में सक्षम हैं.

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