सुरक्षा बलों ने बड़ा आपरेशन चलाते हुए शोपिंया इलाके में 12 और अनन्तनाग क्षेत्र में 1 आतंकी को मार गिराया और एक पकड़ लिया गया. ये आतंकी इन जगहों पर अमरनाथ यात्रा और सुरक्षा बलों पर हमले के लिये साजिश रचने के लिये इकट्ठा हुए थे. इन मारे गये आतंकियों में वे दो रईस ठोकर और इशफाक भी शामिल है जिन्होंने एक शादी समारोह से लेफ्टीनेंट उमर फैयाज को अगवा कर उनकी हत्या कर दी.

पिछली अमरनाथ यात्रा में एक यात्री बस पर उस समय हमला हो गया जब वह किसी अनिर्धारित मार्ग से होकर निकल रही थी. इसमें 14 यात्री मारे गये थे.

काश्मीर के आतंकी अमरनाथ यात्रा को इस्लामी जिहाद की नजर से निशाना बनाये हुए है. उसे किसी भी तरह नुकसान पहुंचाना चाहते है. कुछ सालों पहले ये आतंकी कम्बल बेचने वाले बनकर यात्रा मार्ग पर बैठे थे और मौका पाकर उन्होंने यात्रियों पर हमला किया था.

इस समय भारत सरकार की यह नीति है कि अब काश्मीर के मसले पर पाकिस्तान से कोई बात नहीं करनी है और घाटी में आतंकियों को सैनिक कार्यवाही से ही खत्म किया जायेगा शोपिंया-अनन्तनाग की मुठभेड़ों में क्रास फायरिंग में 4 नागरिक भी मारे गये हैं. इन मुठभेड़ों ने आतंकियों के समर्थन और उन्हें बच निकलने के लिये पत्थरबाजों ने सैनिक बलों पर पथराव भी किया था.

इस मामले में सरकार और सेनाओं को पुन: विचार करना होगा. हाल में ही पत्थरबाजी में पकड़े गये बहुत से लोगों को जेलों से छोड़ दिया गया कि वे आगे से ऐसा नहीं करेंगे. लेकिन काश्मीर घाटी में हर मुठभेड़ में आतंकियों की हिमायत में अभी भी लोग पत्थरबाजी करते ही है. कुछ दिन पूर्व एक मुठभेड़ में इसी पत्थरबाजों के कारण 2 आतंकी सेनाओं की मार से बच निकल गये थे.

सरकार ने यह सख्ती दिखायी है कि अब पाकिस्तान में काश्मीर पर कोई वार्ता नहीं होगी. उसी तरह पत्थरबाजों को भी आतंकी हमला समझा चाहिए और मुठभेड़ में उन पर भी आर्मी-पुलिस फायरिंग होनी चाहिए जो आतंकियों की मदद में सुरक्षा बलों पर हमला करते है. उन्हें आतंकियों से अलग क्यों समझा जाना चाहिए. इससे सुरक्षा बलों को दो मोर्चों पर एक साथ कार्यवाही करनी पड़ती है. लेकिन दोनों में फर्क हो जाता है कि आतंकियों पर गोली चलाई जाती है और पत्थरबाजों पर आंसू गैस या पैलेटन चलती है.

इन मारे गये 13 आतंकियों की हिमायत में घाटी में अलगाववादियों ने बंद का ऐलान किया है.
जम्मू काश्मीर की मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती जो भी सुझाव दे रही हैं वे उचित होते हुए भी घाटी की स्थिति में अव्यवहारिक बने हुए हैं.

एक तो वह चाहती है कि भारत पाकिस्तान वार्ता का रास्ता बंद न करे और वार्ता का दौर चलता रहे. लेकिन मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही दोनों देशों के बीच प्रधानमंत्रियों की वार्ता की तैयारी मेें दिल्ली में दोनों देशों के विदेश सचिवों की बैठक आयोजित की थी लेकिन भारत में किस्तान के उच्चायुक्त श्री बासित ने कश्मीर के अलगाववादियों से वार्ता में तीसरा पक्ष बनाना चाहा. इसलिये मोदी सरकार ने वार्ता रद्द कर दी और यह नीति घोषित कर दी कि काश्मीर मसले पर अब आगे पाकिस्तान से कोई वार्ता नहीं होगी.

श्रीमती गांधी और श्री जुल्फकार अली भुट्टो के बीच हुए शिमला समझौते में दोनों देशों ने यह तय किया है कि काश्मीर का मसला केवल दोनों पक्षों के बीच द्विपक्षीय (बाईलेटिरल) रहेगा और उसी के साथ वह मामला संयुक्त राष्ट्र में निरस्त कर दोनों देशों ने वापस ले लिया.

अब उसमें अलगाववादियों को तीसरा पक्ष बनाना असंभव और अव्यवहारिक है. इसी तरह मेहबूबा चाहती हैं कि काश्मीरी पंडित वहां वापस लौट जायें.आतंकियों ने उन्हें हिन्दू होने के कारण ही घाटी का इस्लामीकरण करने के लिये निकाला है अभी भी अमरनाथ यात्रा पर हमले कर रहे है. ऐसे में उनका लौटना भी अभी संभव नहीं है. पहले वहां आतंकवाद समाप्त हो तभी सब कुछ संभव होगा और इस दिशा में सैनिक कार्यवाही में लगे है.

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