मध्यप्रदेश में हाल ही में जो रिश्वत के मामले पकड़े गए हैं उनमें चपरासी, बाबू, इंजीनियर स्तर के लोगों के पास से भी करोड़ों रुपयों की काली कमाई पकड़ी गई है. अभी इंदौर आर.टी.ओ. का एक क्लर्क भी करोड़पति निकला. इसमें सबसे खास बात यह लग रही है कि इस व्यक्ति ने 9 साल पहले 2003 में फर्जी रसीद कट्टï से करोड़ों रुपयों का घोटाला किया था. उस समय परिवहन विभाग ने मामले को रफा-दफा कर दिया.

सवाल यह है कि जिन अफसरों ने इसे रफा-दफा किया वे खुद कितनी रिश्वत खाते थे. अब उनका पता लगाकर उन पर भी कार्यवाही होना चाहिए. उज्जैन नगर निगम का जो चपरासी 15 करोड़ रुपयों की काली कमाई वाला निकला उसे चपरासी से स्टोर कीपर किसने बनाया था और वह खुद कितनी रिश्वत खाता था. गत नवम्बर में उज्जैन में ही 10 करोड़ रुपयों का असिस्टेंट आर.टी.ओ. सेवाराम पकड़ा गया था. अब यह निश्चित सा लगता है कि परिवहन विभाग और इन जैसे कमाई वाले अन्य विभागों में लगभग ऊपर से नीचे चपरासी तक सभी ने करोड़ों में रिश्वत व हेराफेरी से काली कमाई की है. जो कुल मिलकर अरबों-खरबों रुपयों में होगी. एक अमेरिकी संस्था ने हाल ही सर्वे में बताया है कि भारत में जमीन की रजिस्ट्री, हस्तांतरण, नामांकन आदि में राजस्व विभाग के दफ्तरों में भारी रिश्वत चलती है.

प्रस्तावित लोकपाल कानून में इसी सी वर्ग में आने वाले अफसरों व बाबुओं पर यह विवाद है कि इन्हें लोकपाल के दायरे में रखा जाए या नहीं. केन्द्र सरकार का विचार था कि इन लोगों के भ्रष्टाचार सेन्ट्रल विजीलेन्स आयोग में रखा जाए. यह आयोग एक लम्बे अर्से से कायम है. लेकिन रिश्वतखोरी पर कोई लगाम नहीं लगी. मध्यप्रदेश में आई.ए.एस. के जोशी दम्पति और छत्तीसगढ़ के आई.ए.एस. श्री अग्रवाल भी पकड़े गये हैं. इसी से यह सिद्ध होता है कि इस आयोग के रहते हुए भी लोकपाल की जरूरत महसूस की जा रही है. यही पर्याप्त कारण है कि सी.वी.सी. को या तो खत्म कर दिया जाए या लोकपाल में समाहित कर दिया जाए. यह भी एक विडम्बना है कि हाल में सी.वी.सी. श्री पी.टी. थोमस भी भ्रष्टाचार के मामले में आयोग से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हटाये गये.

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