नई दिल्ली, 26 दिसंबर. दिल्ली के कुछ नामी अस्पतालों में सुपरबग की मौजूदगी की पुष्टि के बाद सरकार ने इस मामले में विस्तृत स्टडी कराने का फैसला किया है.

इस कार्यक्रम के तहत ऐसे बैक्टीरिया और वायरस की पहचान भी की जाएगी , जिन पर बहुत से एंटीबायटिक्स का असर नहीं हो रहा है. इस स्टडी की कमान इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ( आईसीएमआर ) के हाथों में सौंपी गई है. लांसेट ने इस साल अप्रैल में फिर अपने एक अन्य अध्ययन के हवाले से दावा किया था कि दिल्ली के पानी और पर्यावरण में भी सुपरबग मौजूद हैं. लांसेट के इस दावे को भी सरकार ने खारिज कर दिया था. लेकिन इसी साल जब अक्टूबर में दिल्ली के एक नामी अस्पताल ने अपने यहां सुपरबग न्यू डेल्ही मेटालो बीटा लेक्टामेज ( एनडीएम -1) की मौजूदगी की बात कुबूली तो सरकार के पास पूरे मामले की जांच कराने के अलावा कोई चारा नहीं बचा. जांच में पाया गया कि दिल्ली के कुछ प्रमुख सरकारी अस्पतालों में भी एनडीएम -1 मौजूद है. हालांकि इसमें पाया गया कि इन अस्पतालों में इसकी मौजूदगी बहुत ज्यादा नहीं है , लेकिन फिर भी इसे चिंता की बात माना गया.

कई वायरस भी हुए बेकाबू-आईसीएमआर ने देश में एनडीएम -1 के साथ ही कहीं कोई और सुपरबग भी तो नहीं पनप रहे हैं , यह जानने के लिए पूरे देश के वैज्ञानिकों से शोध प्रस्ताव आमंत्रित किए. सूत्रों का कहना है कि काउंसिल को एक अर्से से वैज्ञानिकों द्वारा लगातार सूचना दी जा रही थी कि कई बैक्टीरिया और वायरस पर बहुत सी दवाओं का असर नहीं हो रहा है. इन प्रयासों को सिलसिलेवार तरीके से आगे बढ़ाने के लिए काउंसिल ने शोध प्रस्ताव आमंत्रित किए. स्टडी के तहत उस पैटर्न का पता लगाने का प्रयास भी किया जाएगा , जिनकी वजह से बैक्टीरिया या वायरस पर दवाओं का असर नहीं हो रहा है या कम होता जा रहा है.

अस्पताल भी अनसेफ !-अगर सुपरबग पाए गए तो पता लगाया जाएगा कि इनकी मौजूदगी कितनी है और इनसे निपटने के लिए क्या किया जा सकता है. एनडीएम -1 पर कार्बापेनेम जैसे अत्याधुनिक एंटीबायोटिक का भी असर न होना वैज्ञानिकों के लिए चिंता की बात बना हुआ है. इस बात के भी प्रयास किए जा रहे हैं कि देश में और ताकतवर एंटीबायोटिक्स का विकास किया जाए. दिल्ली के जिस निजी अस्पताल ने अपने यहां सुपरबग के होने की बात कुबूली वह देश के उन चुनिंदा अस्पतालों में है , जिसे नैशनल एक्रीडेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स से मान्यता प्राप्त है. इस बोर्ड से मान्यता प्राप्त अस्पताल ही विदेशी मरीजों के इलाज के लिए अधिकृत होते हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जब इतने बड़े अस्पताल का यह हाल है तो देश के सरकारी और अन्य अस्पतालों की हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है.

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