मध्यप्रदेश में नदी जोड़ योजना में नर्मदा से मालवा अंचल की क्षिप्रा, गंभीर, पार्वती व कालीसिंध में पानी पहुंचाया जायेगा. वैसे भौगोलिक व प्राकृतिक परिभाषा में नदी का अर्थ ही सतत बहने वाली जलधारा होता है अन्यथा वे मौसमी नाले होते हैं जो वर्षाकाल में जल में भरपूर होकर चढ़ जाते हैं और कुछ ही घंटों में उतर जाते हैं. नदी की बाढ़ व उसके उतरने में एक लम्बा समय लगता है. किसी नदी का सही दोहन यही है कि ऐसी व्यवस्था कायम रहे कि बाढ़ का पानी नदी के वेग की स्वाभाविक शक्ति से ही दूसरे इलाकों में उसी तेजी से पहुंच जाए.

नदी से नदी में पानी डालने का अर्थ ही यही है कि अब वे नदियां ही नहीं हैं. जरूरी है कि ऐसी छोटी या सूख जाने वाली नदियों में मिलने वाले नालों को लम्बा-चौड़ा कर सहायक नदियां बना दिया जाए. ऐसे में नाले अपने आप में स्थाई प्राकृतिक नहर बन जायेंगे. नर्मदा से अन्य नदियों में पानी डालना यह इंजीनियङ्क्षरग व विकास कार्य की उपलब्धि तो निश्चित तौर पर है, लेकिन वह पानी दी जाने वाली नदियों के अस्तित्व पर ही प्रश्रचिन्ह है. हर साल की तरह इस साल भी मध्यप्रदेश अतिवर्षा व बाढ़ से प्रभावित रहा. काफी खर्च लोगों को बचाने, राहत व पुनर्वास पर करना पड़ता है. इसका एक बड़ा कारण पानी की निकासी के नालों पर रुकावट होना या उन पर निर्माण होना है. इन्हीं सबको अब सहायक नदियों का रूप दे दिया जाए.

पिछले राजस्व रिकार्ड से यह ज्ञात हो ही चुका है कि क्षिप्रा में मिलने वाली लगभग 13 सहायक नदियां लुप्त हो चुकी हैं. उनमें पानी की कमी के मौसम गर्मी में खेतों का आकार उनमें बढ़ा दिया गया और एक समय आने पर वे लुप्त हो गईं. हर नदी की मूल धारा उद्गम से बहुत छोटी ही होती है. उसे मुख्य धारा के रूप में उसकी सहायक नदियां और उससे मिलने वाले मौसमी नाले ही बनाते हैं. उज्जैन के सिंहस्थ की नदी वेद पुराणों में उल्लेखित पावन नदी के रूप में प्राचीन काल से अस्तित्व में है. अब ऐसा क्या हो गया कि वह अपने आप कुछ नहीं है. सिंहस्थ के समय भी उसमें दूसरे स्रोतों से पानी डालकर पर्व स्नान संपन्न कराया जाने लगा है. इन नदियों का अपना स्वयं का अस्तित्व है और आज वे अपने अस्तित्व के लिए नर्मदा की आश्रित हो गई हैं. इनका स्वयं का अस्तित्व ही इनकी गरिमा है वरना इनका नाम ही अनामिका हो जाएगा.

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