लोकसभा सत्र के पहले दिन भाजपा के नेता श्री लालकृष्ण आडवानी कुछ की जगह कुछ और कह बैठे और सदन में हंगामा हो गया. यू.पी.ए. अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी जो शांत ही रहती हैं वे भी आपे से बाहर हो गईं. स्पीकर श्रीमती मीरा कुमार ने श्री आडवानी का कथन कार्यवाही से निकाल दिया.

लेकिन श्री आडवानी ने जो सफाई दी वह कहीं से सफाई नहीं है. उनका कहना कि यूपीए की पहली सरकार को अवैध मानते हैं. हालांकि वह उसे यू.पी.ए. की दूसरी सरकार कह बैठे थे जिस पर उन्होंने गलती मानी. और उसे यूपीए की पहली सरकार बताया. लेकिन सरकार की वैधता का प्रश्न संवैधानिक व कानूनी पहलू है. इसे या तो राष्टपति या सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच तय कर सकती है. यह राजनैतिक मत या कथन नहीं हो सकता. श्री आडवानी यू.पी.ए. के प्रथम काल में सांसद थे न भी होते तब भी इस प्रश्न को राष्टपति या सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उठाना था. वैसा किया नहीं गया था. हर चीज राजनैतिक नहीं है. उसी तरह सरकार की वैधता राजनैतिक परिधि में नहीं आती. इसलिए श्री आडवानी ने सफाई में जो कहा कि उनका कथन यू.पी.ए. की प्रथम सरकार के बारे में था- वह सफाई में भी गलत ही है.

कर्नाटक में मुख्यमंत्री बोम्मई की जनता दल की सरकार को बर्खास्त करना हाईकोर्ट ने अवैध करार दिया था. उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह सरकार को हटाने के गुजराल सरकार के प्रस्ताव को राष्टï्रपति ने मंत्रीमंडल को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया था, जिसे मंत्रिमंडल ने दुबारा न भेजकर ”लेप्सÓÓ हो जाने दिया. श्री आडवानी जैसा वरिष्ठï सांसद इसे राजनैतिक मसला माने यह उनकी मन:स्थिति को दर्शाता है. वे एक अरसे से हाल बेहाल चल रहे हैं. हाल ही में उन्होंने अपने ब्लाक में आने वाले 2014 के लोकसभा चुनावों पर कह डाला कि उसमें न कांग्रेस व भाजपा बल्कि तीसरे खेमे का कोई व्यक्ति इन दोनों पार्टियों में से किसी एक के सहयोग से प्रधानमंत्री बन सत्ता में आ सकता है. तुरन्त ही उनके पार्टी के भूतपूर्व अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह व एन.डी.ए. के संयोजक श्री शरद यादव ने उनके बयान को नकारते हुए एन.डी.ए. के सत्ता में आने की संभावना जताई.

उनका यू.पी.ए. प्रथम की सरकार को अवैध कहना इसलिए भी राजनैतिक नहीं हो सकता क्योंकि राजनैतिक तौर पर यू.पी.ए. चुनाव में जीत कर ही दूसरी बार लगातार  सत्ता में बना रहा. श्री आडवानी की मनोदशा इसलिए भी ठीक नहीं है कि उन्हें पार्टी ने प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया था और चुनावों में यह महत्वाकांक्षा धराशायी हो गई. उनका ‘फील गुडÓ  भी ‘फील बेड’ हो गया. यू.पी.ए. के दूसरे कार्यकाल में ऐसा लगा जैसे उन्होंने नेता विपक्ष के पद से वी.आर.एस. (स्वैच्छिक पद निवृत्ति) ले ली है. लेकिन नेता विपक्ष बनी श्री सुषमा स्वराज उन्हें आचरण व कथनों में वरीयता देती रहीं. लेकिन जैसे 2014 के आने वाले लोकसभा चुनाव के बारे में उनकी ही पार्टी ने प्रधानमंत्री पद के लिये श्री नरेंद्र मोदी का नाम आगे किया तो श्री आडवानी भड़भड़ा गये. उन्हें ऐसा लगा जैसे पार्टी ने उन्हें ”रिटायर नेता” का दर्जा दे दिया. उन्हें निष्क्रिय मान लिया. उन्होंने अपनी सक्रियता ”रिन्यू” करने के लिये फटाफट ”भ्रष्टïचार” को मुद्दा बनाकर उनकी ”कापी राइट” शैली में रथयात्रा निकाल दी. इसके साथ ही उन्होंने आगामी चुनाव के लिये पार्टी की ओर से इसे मुख्य मुद्दा बनाया है. उनके हाल के ब्लॉग में तीसरे मोर्चे का प्रधानमंत्री का संकेत देना भी आडवानी-मोदी के नामों के बीच की राजनीति ही लगती है. बिहार के मुख्यमंत्री व एन.डी.ए. की सहयोगी जनता दल यूनाइटेड  के नेता श्री नीतेश कुमार ने एकाएक श्री मोदी के विरुद्ध बयानबाजी तेज कर दी है. लोकसभा सत्र में भी असम के मसले पर श्री आडवानी ने सुषमा स्वराज के स्थान पर स्वयं आगे आकर नेता विपक्ष की भूमिका निभा डाली. वे इन दिनों राजनैतिक रूप से परेशां हाल है.

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