भारत का फैसला यूएस पर तमाचा: निकोलस बन्र्स

वाशिंगटन, 20 फरवरी. अमेरिका के एक पूर्व राजनयिक ने कहा है कि अमेरिका जहां एक तरफ ईरान को अलग-थलग करने के लिये अंतरराष्ट्रीय समुदाय को एकजुट करने में लगा है वहीं ईरान से तेल आयात जारी रखने का भारत का फैसला अमेरिका के मुंह पर तमाचा है।

अमेरिका के राजनीतिक मामलों के पूर्व उप विदेश मंत्री निकोलस बन्र्स ने  लिखा है, ‘हम जैसे उन लोगों के लिये यह दुखद खबर है जिन्होंने भारत के साथ संबंध बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। यह पिछले तीन अमेरिकी राष्ट्रपति के प्रयासों को भी झटका है जिन्होंने भारत सरकार के साथ करीबी तथा रणनीतिक संबंध स्थापित करने की कोशिश की।’ भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु करार को अमली जामा पहनाने में बन्र्स बुश प्रशासन के प्रमुख सूत्रधार थे।  ईरान मामले में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ भारत का अलग रूख अपनाना अमेरिका के मुंह पर न केवल तमाचा है बल्कि यह अमेरिका की नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल खड़ा करता है। भारत ने ईरान से तेल आयात कम करने से मना कर दिया। वह अपने कुल तेल आयात में से 12 प्रतिशत के लिये ईरान पर निर्भर है। बन्र्स ने  दलील दी थी कि अमेरिका को भारत के साथ महत्वकांक्षी, दीर्घकालीन रणनीतिक संबंधों को लेकर प्रतिबद्धता दिखानी चाहिए।  मैं दोनों देशों के लिये इसके महत्व को समझता हूं।

ईरान मामले में भारत का असहयोगी रवैया, अमेरिका-भारत असैन्य परमाणु समझौते के क्रियान्वयन में गतिरोध और इसके बाद अब भारत सरकार सक्रिय तौर पर अमेरिका के साथ जो रणनीतिक रिश्ते बनने चाहिये थे उसमें भी बाधा खड़ी कर रही है। राष्ट्रपति बराक ओबामा तथा पूर्व राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश ने कई मौकों पर भारत के साथ सहयोग बढ़ाने के लिये अपनी प्रतिबद्धतायें जताई लेकिन दुर्भाग्य से भारत ने ओबामा और बुश की पेशकश के जवाब में वैसी गर्मजोशी नहीं दिखाई।

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