उत्तरप्रदेश,पंजाब और गोवा के विधानसभा चुनावों में मिली पराजय के कारणों का पता लगाने के लिये कांगे्रस आलाकमान द्वारा बनाई गई ए.के. एंटोनी कमेटी की रिपोर्ट पार्टी के चंद बड़े और बड़बोले नेताओं को डरा रही है. इस रिपोर्ट में पार्टी की पराजय के लिये टिकटों के बंटवारें में चले भाई-भतीजावाद और कुछ प्रमुख नेताओं की अनर्गल बयानबाजी को ही प्रमुख रूप से जिम्मेदार माना गया है. इसमें श्री एंटोनी ने कैप्टन अमरेन्दर सिंह को खुदगर्ज किस्म का व्यक्ति बताते हुए उन्हे बतौर मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करने को पार्टी की भारी भूल बताते हुए कहा है कि इसके चलते ही पंजाब में कंग्रेस की लुटिया डूब गयी.  उन्होने इस रिपोर्ट में महंगाई और भ्रष्टाचार को भी हार की एक प्रमुख वजह तो बताया है लेकिन पार्टी और उसकी अगुवाई वाली केन्द्र सरकार इस पर अंकुश किस तरह प्राप्त करेगी, इसके उपाय बताने से परहेज किया है.

यदि कांगे्रस आलाकमान इस रिपोर्ट को अक्षरश: मानने का निर्णय लेती है तो वह पार्टी और उसकी कार्य संस्कृति में आमूलचूल बदलाव लाने की ओर बढ़ सकती है. इसी तरह उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान अपनी बयानबाजी से माहौल खराब करने वाले दिग्विजय सिंह, बेनीप्रसाद वर्मा, श्री प्रकाश जायसवाल और सलमान खुर्शीद सरीखे वाग्विलासी नेताओं को किनारे भी कर सकती है. हालांकि श्री एंटोनी ने अपनी रिपोर्ट में पार्टी का स्वास्थ्य सुधारने के लिये जितनी सिफारिशें की हैं उन सब को मानना या एकमुश्त लागू करना कतई असंभव है. लेकिन उन्हें पूरी तरह दरकिनार करना पार्टी की भावी चुनावी संभावनाओं को पलीते लगाने जैसा ही होगा. बहरहाल, कांग्रेस आलाकमान  द्वारा उत्तरप्रदेश में मिली पराजय  के कारणों का पता लगाने का जिम्मा श्री एंटोनी को दिये जाने के साथ ही यह साफ हो गया था कि श्री राहुल गांधी  इस हार से खासे नाखुश हैं और इसके लिये जिम्मेदार लोगों पर गाज गिराना चाहते हं. श्री गांधी ने  उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावों में हिमालयी उम्मीदों के साथ प्रचार की कमान सम्हाली थी. उन्होंने दूसरे तमाम नेताओं से अधिक दौरे तो किये ही वरन् सर्वाधिक सभाएं भी लीं.

ऐसे में यदि वहां के चुनाव परिणाम बेहतर होते तो देश में मिशन 2014 के लिये कांग्रेस का अच्छा माहौल भी बनता. लेकिन अब सारा किया धरा जस का तस रह गया. अब इसकी पुनरावृत्ति को रोकने के लिये वे किसी भी हद तक जाने और जिम्मेदार लोगों पर कार्यवाही करने की मानसिकता में हैं. उनके इस मूड  को भांपने के कारण ही सलमान खुर्शीद समेत बड़े नेताओं ने मंत्री पद  छोड़कर संगठन के लिये काम करने की इच्छा जताने में देर नहीं की. लेकिन अब गेंद श्री राहुल गांधी तथा उनके रणनीतिकारों के पाले में हैं. इस बात के पूरे आसार हैं कि वे पुराने और अडिय़ल प्रवृत्ति के घिसेपिटे नेताओं की जगह युवा और तरोताजा तथा बेदाग छवि वाले लोगों को कांग्रेस की अग्रिम पंक्ति में देखना चाहते हैं. पार्टी के प्रचार तंत्र को भी वे और अधिक आक्रामक तथा जनोन्मुखी बनाने चाहते हैं. इसके लिये किन-किन नेताओंं को किनारे अथवा आगे किया जाता हैं, इस ओर सबकी नजर रहेगी.

इस बात की पूरी संभावना है कि  पार्टी की सूरत और सीरत बदलने के इस क्रम में युवा महासचिव का  ध्यान आगामी लोकसभा चुनावों से ऐन पहले विधानसभा चुनावों का सामना करने जा रहे मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक तथा राजस्थान सरीखे राज्यों पर कुछ अधिक ही रहेगा. इसके लिये यहां भी पार्टी युवाओं को प्रोत्साहन देने की अपनी नीति के तहत कुछ पुराने नेताओं को बैरकों तक सीमित रहने का कह सकती है. जाहिर है कि खनिज संपदा से भरपूर इन राज्यों के चुनाव कांग्रेस आलाकमान के लिये मिशन 2014 से पहले के एसिड टेस्ट सरीखे होंगे और श्री राहुल गांधी इस टेस्ट में कांग्रेस को हर हाल में सफल देखना चाहेंगे.  लिहाजा पार्टी की युवा सूरत और नई सीरत तथा आक्रामक तेवरों का नजारा भी छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक सरीखे राज्यों में ही सबसे पहले देखने को मिल सकता है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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