अब तो भोपाल में पड़े यूनियन कार्बाइड के रासायनिक कचरे के विषय को देश के या कम से कम भोपाल के सभी विश्व विद्यालयों को इसे शोध का विषय बना लेना चाहिए. शोध में यह पता लगाना चाहिए कि आखिर क्या वजह है कि यह कचरा पिछले 28 सालों के बाद भी सभी के द्वारा सभी तरह के प्रयास करने के बाद भी टस से मस नहीं हो रहा है- क्या यह ”अंगद का पांव” है. जो स्कालर यह शोध कर ले उसे डॉक्टर ऑफ साइंस की उपाधि दी जाए.

भोपाल के गैस पीडि़त, राज्य सरकार, केंद्र सरकार और सर्वोच्च न्यायालय सभी पूरी ताकत से इसे हटाने के लिए जोर लगा रहे हैं और यह उन सबको चुनौती देता हुआ अपनी जगह कायम है. हाल ही में खबर आई थी कि जर्मनी की एक फर्म से यह करार हो गया है कि वह इस कचरे को अपने देश में ले जाकर वहां खत्म कर देगी. इसकी ढुलाई पर 28 करोड़ रुपयों का खर्च आएगा और यह रकम केंद्र सरकार देगी. लेकिन अभी तक कुछ होता नजर नहीं आ रहा है.

अब फिर खबर आई है कि सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह फैक्ट्री के आसपास फैले रासायनिक जहरीले कचरे का 6 महीनों में निष्पादन करें. सुप्रीम कोर्ट ने तो यह अल्टीमेटम दे दिया लेकिन राज्य सरकार के सामने यह प्रश्न है उसके पास इसे खत्म करने के न तो कोई साधन हैं और न ही कोई ज्ञान है कि यह कैसे खत्म किया जाए. अब सुप्रीम कोर्ट, केंद्र सरकार या दुनिया की कोई और संस्था यहां आकर बता दे कि इसे ऐसे खत्म किया जाए अन्यथा यह जैसा है वैसा ही पड़ा रहेगा.

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