भारत के मुख्य न्यायाधीश श्री एस.एच. कपाडिया ने ही यह महसूस किया कि अदालतों को उनके संवैधानिक सीमा क्षेत्र में रहना चाहिए. उनका काम नीति निर्धारण या शासन करना नहीं है. संविधान में नागरिकों के मूलभूत अधिकार निर्धारित किये गये है. इनका वैधानिक विश्लेषण भी हो सकता है. लेकिन उन विश्लेषणों के जरिये उन्हें विस्तारित नहीं किया जाना चाहिए. संविधान संशोधन संसद का अधिकार है. फैसले या टिप्पणियों के जरिये उनके सुझावों का वजन होगा.

लेकिन यदि कोई व्यक्ति किसी मसले पर अदालत में जाता है तो उसे उस पर कोई न कोई कार्यवाही करनी ही होगी. किसी याचिका को खारिज करना भी न्यायिक कार्यवाही ही होती है. भ्रष्टाचार पर सांसदों के निष्कासनों पर उनमें से कुछ अदालत चले गये थे. उस समय लोकसभा अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी ने अदालत का नोटिस लेने से इंकार कर दिया था कि संसद किसी भी अंदरूनी कार्यवाही के लिये वह स्वायत्ताधिकारी….. है और उसमें अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती. वे अपनी जगह सही थे और अदालत भी उसकी जगह सही थी कि उसके सामने मामला लाया गया तो उसने दूसरे पक्ष (संसद) की बात जानने के लिये नोटिस जारी किया. लोकसभा अध्यक्ष ने जो भी कहा वह भी अपने आप में अदालत को उनके अधिकार की बात बताना था. किसी बात से इंकार करना भी उसके बारे में बताना ही होता है.

अदालत की कुछ राय को शासन की नीति निर्धारण करना या शासन चलाना नहीं कहा जा सकता. मौसम की मार और भंडारण की कुव्यवस्था में देश में लाखों टन गेहूं खराब हो रहा था. वर्षा में सड़ा रहा था. बोरों में उगने लगा था. उस समय एक संस्था अदालत चली गई और न्यायालय ने यह कहा कि इस तरह गेहूं बरबाद करने से अच्छा होगा कि सरकार उसे गरीबों में मुफ्त बांट दें. इस टिप्पणी को नीति निर्धारण करना या शासन चलाना नहीं कहा जा सकता.

जीवन में विवेक से तो सभी काम करते है, लेकिन उससे विवेकहीनता या गलतियां भी होती है. संविधान में विवेक का निर्धारण न्यायपालिका करती है. संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित किया गया विधेयक और विधि असंवैधानिक करार भी दिये गये है. और वे रद्द हो गये. यह भी एक मान्य स्थिति है कि शासन और राजनीति में भावुकता का कोई स्थान नहीं है. लेकिन वह निर्मम और निर्दयी भी नहीं है. उसे केवल यथार्थ, व्यवहारिकता व संसद… की सीमा में चलना होता है. लोगों के आम जीवन में भी यही सिद्धांत ही कारगर होता है.

आंध्र में दो बार शासन ने यह प्रयास किया कि धर्म के नाम पर मुसलमानों को नौकरियों में आरक्षण दिया जाए और दोनों बार न्यायालय ने उसे असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया. इन दोनों पदोन्नति में आरक्षण का मामला इसी प्रक्रिया व विचार में उलझ रहा है. न्यायालय की यह टिप्पणी कि शासन पूरी की पूरी सार्वजनिक वितरण… प्रणाली (पी.डी.एस.) भ्रष्टï है. एक ऐसा यथार्थ है जो बिल्कुल उजागर सत्य है.

जब सरकार की मनमानी होती है और लोग अदालत के पास न्याय और निर्देश पाने के लिये जाते हैं तब न्यायापलिका उन्हें बेरंग लौटा नहीं सकती. उसे अन्याय देखना और न्याय देना ही होगा. भारत का संविधान बिलकुल यथोचित और उत्कृष्टï अभिलेख है. सब अंगों… की सीमा में व अधिकार सुनिश्चित है. संविधान की मर्यादा के अनुकूल यही होगा कि सरकार संसद व न्यायपालिका एक दूसरे के अधिकार क्षेत्र का स्वत: सम्मान करे और अपने अधिकार क्षेत्र का पूरा उपयोग करें.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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