नई दिल्ली, 20 फरवरी. आपराधिक मामले में प्रक्रियात्मक दोषों को अपराधी को छोडऩे या मामले की फिर से सुनवाई का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए जरूरी है कि ऐसा लगे कि उन त्रुटियों के कारण अभियुक्त के साथ न्याय नहीं हो पाया।

न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने यह व्यवस्था दी है। हत्या के मामले में दोषी मध्य प्रदेश के रत्तीराम, सत्यनारायण और अन्य की अपील खारिज करते हुए पीठ ने यह नियमन दिया। पीठ ने कहा कि निश्चित तौर पर मामले की सुनवाई ठीक से हो किसी भी हाल में पूर्वाग्रह के कारण अभियुक्त को नुकसान नहीं होना चाहिए। पीठ ने यह भी कहा कि लेकिन, हर प्रक्रियात्मक दोष या हर निषेध जिसे स्वीकार किया गया है और उचित स्तर पर आपत्ति नहीं की गई तो उससे सुनवाई पर दाग नहीं लगता या वह अनुचित नहीं होता। एक दलित की हत्या के अपराध में मध्य प्रदेश की निचली अदालत ने वर्ष 1996 में दोषियों को उम्र कैद की सजा सुनाई थी। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भी उनकी सजा को बरकरार रखा था। दोषियों ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। मामले की फिर से सुनवाई की मांग इस आधार पर की थी कि मामले को आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 193 के तहत एक मजिस्ट्रेट द्वारा अदालत में भेजा जाना था। लेकिन निचली अदालत ने पुलिस द्वारा पेश आरोप पत्र पर स्वत: संज्ञान ले लिया। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी यह दलील न मानने हुए अपील खारिज कर दी।

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