हर देश की रक्षा व्यवस्था का यह मान्य सिद्धांत है कि समय शांति का हो या युद्ध का, सेनाओं और सैनिक तैयारियां हमेशा इस हालत में रहती हैं या रहनी चाहिए कि किसी भी क्षण कहीं से भी हमला हो तो सेनाएं फौरन युद्ध रत् हो जाएं. इसकी सबसे बड़ी मिसाल द्वितीय विश्व युद्ध के समय देखने में आई. द्वितीय विश्व युद्ध 1939 से 1945 तक लगभग 6 साल चला. लेकिन उसके बाद सोवियत संघ व अमेरिका के नेतृत्व में परस्पर विरोधी ”शीत युद्ध” 1991 सोवियत संघ के बिखराव तक 46 साल चला. इस शीत युद्ध की सैनिक तैयारी में इतना धन खर्च हुआ जो द्वितीय विश्व युद्ध पर हुए खर्च से 209 प्रतिशत ज्यादा था.

भारत ने भी आजादी के साथ ही काश्मीर पर पाकिस्तान पर आक्रमण देखा. उसके बाद पाकिस्तान से तीन और युद्ध हुए. इसके अलावा भारत ने 1962 में चीन का आक्रमण भी देखा जो एकाएक हुआ था. उस समय यह प्रगट हो गया कि हमारी कल्पना में वह युद्ध नहीं था और हम तैयारी में नहीं थे. सामान्य रूप से सीमा चौकी पर फौजी तैनात थे. वहां युद्ध जैसी कोई तैयारी नहीं थी. भारत के लिए यह बड़ी अपमानजनक स्थिति थी कि हम 1962 में परास्त राष्टï्र माने गए.

लेकिन इसके बाद भारत सम्हला और रक्षा तैयारियों की तरफ ध्यान दिया गया लेकिन इसमें पूरी गतिशीलता श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रीकाल में हुई. इसी समय उन्होंने भारत की रक्षा प्रणाली में मिसाइल कार्यक्रम तैयार किया. बंगला देश के निर्माण युद्ध के समय भारत फौजी तौर पर इतना तैयार था कि चीन पाकिस्तान के पक्ष में भारत को परोक्ष रूप से भभकियां देता रहा लेकिन जरा भी आगे बढऩे की हिम्मत न जुटा सका. उस समय अमेरिका में अब तक का सबसे बड़ा भारत विरोधी प्रशासन निक्सन-किसिंजर का था. वह भी बंगलादेश युद्ध में अमेरिकी नेवी का सेविंथ फ्लीट भेजने की भपकी भर देता रहा- आगे नहीं बढ़ा.

इसी समय का प्रारंभ किया मिसाइल कार्यक्रम आज इतना विशाल व विकसित हो चुका है कि हम दुनिया के उन बड़े राष्ट्रों अमेरिका, रूस, फ्रांस और चीन के समकक्ष हो गए जिनके पास अंतर महाद्वीपीय बैलास्टिक मिसाइल है लेकिन कभी स्थितियों में इतना अंतरविरोध देखने में आता है कि अत्यंत क्षोभ भरी हैरानी होती है. इसी समय जब हमने अंतरमहाद्वीप मिसाइल बनाई उसी समय यह खबर भी आ गई कि भारत की सेना पर पर्याप्त गोला बारूद नहीं है, टैंक, ट्रक नहीं हैं- अगर ऐसे में युद्ध हो जाए तो लडऩे लायक हमारी तैयारी नहीं है. यह चेतावनी इसलिए जमीनी हकीकत है कि यह बात सेना प्रमुख जनरल वी.के. सिंह ने स्वयं भारत के प्रधानमंत्री को पत्र में लिखा था.

हैरानी और भी बढ़ जाती है कि इन दोनों के बीच का इतना गोपनीय पत्राचार ”लीक” हो गया और सारी दुनिया जान गई कि हम रक्षा तैयारियों में कितने ”गरीब” हैं. क्या विडम्बना है कि आसमान में हमारे पास सबसे शक्तिशाली मिसाइल है और जमीन पर साधारण सा गोला बारूद नहीं है. रक्षा मंत्री श्री एन्टोनी का रवैया व प्रतिक्रिया भी अजीब रही. उन्होंने खंडन किया कि गोला बारूद की कोई कमी नहीं है. फौजें बिल्कुल चाक-चौकस हैं. उसी समय सैन्य अधिकारियों की मीटिंग में फौजी साजो-सामान की समीक्षा करते हुए फौरन ही पर्याप्त खरीदी के फंड जारी किये और तत्काल व्यवस्था करने के आदेश भी दिए. एक तरफ खंडन कर रहे थे और दूसरी तरफ ताबड़तोड़ तैयारियों के आदेश व फंड दे रहे थे.

रक्षा के मामले में इतनी लेतलाली और लेट लतीफी बिल्कुल क्षम्य नहीं है. भारत आर्थिक व्यवस्था में उभर के सामने आ रहा है उसे रक्षा के मामले में एक बहुत शक्तिशाली राष्ट के रूप में भी सामने आना होगा. श्रीमती इंदिरा गांधी के शासनकाल में भारत की सैन्य शक्ति का दुनिया में जबरदस्त दबदबा था. एक राष्ट बंगला देश का निर्माण हो गया और असम के जिस इलाके में ‘नेफा’ नाम से प्रशासित क्षेत्र का शासन था उसे ‘अरुणाचल प्रदेश’ का राज्य बनाया और इसी क्षेत्र में चीन के सबसे बड़े दबाव वाले क्षेत्र तवांग में अत्यंत मजबूत सैन्य व्यवस्था कर दी. रक्षा के मामले में इस समय सब कुछ ठीक ठाक नहीं है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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