• विशेष संपादकीय

भारत की आजादी के 65 साल बीत जाने की यात्रा का सिंहावलोकन एकदम निराश नहीं करता है। इस दौरान भारत के सामने अनेक चुनौतियां आई। हम पर पिछड़ेपन का लेबल पहले से ही चस्पा था। देश पर पड़ोसियों के आक्रमण हए। बाहरी आतंकवाद ने हमें जर्जर करने की नाकामयाब कोशिशें कीं। भीतरी आतंकवाद और अलगाववाद की आग में हम कई बार झुलसे।

बेरोजगारी, भूख, दहशत, अनाज-आयात, बुनियादी सुविधाओं में बहुत पीछे रहने जैसी परेशानियों को झेलते हुए  हमारेे देश ने हर चुनौती को पराजित किया है। हम मजबूती के साथ खड़े हुए हंै। आजादी पर्व के इस प्रसंग पर हमें यह कहने में कतई हिचक नहीं है कि  अंतरिक्ष, विज्ञान, सूचना क्रांति, टेक्नालाजी, रक्षा, चिकित्सा, शिक्षा सहित अनेक मोर्चों पर भारत का रंग चमक रहा है। हमारी सफलता के परचम लहराए जा रहे हैं। अनेक देश हमें ईष्र्या या टेढ़ी नजर से देखते हैं। आर्थिक रूप से भारत सशक्त हो रहा है। कृषि के क्षेत्र में हमने जो प्रगति की है, आज उसकी सराहना दुनिया कर रही है। तमाम आपदाओं के बावजूद हमारे अनाज के भण्डार भरे पड़े हैं। आयात पर हमारी निर्भरता समाप्त हो रही है। खेलों में भी हमने इस ओलंपिक में बेहतर प्रदर्शन किया है। देश की एक और उपलब्धि है कि हमारी सड़कों का नेटवर्क सुधर रहा है।

भारत के बड़े शहरों के मॉल अपनी चकाचौंध से विकास के ‘समर्थक हस्ताक्षरÓ प्रतीत हो रहे हैं। इसमें कोई संकोच नहीं कि आजाद भारत – निरंतर विकास की ओर अग्रसर हो रहा है, लेकिन समग्र विकास और समता-मूलक समाज की कल्पना के चित्र में अभी अनेक रंग भरना बाकी है। कृषि की प्रगति के साथ-साथ व्यवस्था यह भी बनानी है कि भारत के अन्नदाता किसान के माथे पर सलवटें नहीं रहें। उसे बुनियादी सुविधाएं मिलें और प्रसंस्करण इकाइयों का जाल बिछ जाए। औद्योगिक विकास पर अभी और ज्यादा ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। हमारे देश की बुनियादी और ग्राम प्रधान व्यवस्था के संदर्भ में आर्थिक नीतियों में और बेहतर विमर्श की संभावनाएं है। विकास दर, सेंसेक्स, मुद्रास्फीति, विदेशी मुद्रा से तुलना आदि कारकों का पैमाना – समाज के अंतिम व्यक्ति की खुशी से सीधा जोड़कर देखा जाना जरूरी है। अन्यथा डीजल का इंजन और काठ के पहिए की कहावत के माफिक हमारी प्रगति की रफ्तार सदा सवालों में घिरी रहेगी। महंगाई से राहत और कम ब्याज के कर्ज – आम आदमी को सुकून देने की दिशा मे बड़े कदम हो सकते हैं।

आजादी पर्व पर हमारे देश की सामाजिक संरचना के ताने-बाने पर भी चिंतन प्रासंगिक है। सिविल सोसाइटी के सक्रिय होने के बाद वास्तविक तौर पर सामाजिक नेतृत्व की पहल पर आस बंधी थी। लेकिन इस क्षेत्र में भी विश्वास के संकट की जो आशंका प्रकट की जा रही थी, प्रतीत होता है किसी हद तक सही निकली। उनकी जो छवि देश में बनने लगी थी, उसे गहरा धक्का लगा है। उन पर आरोपित राजनीतिक मंशा की बातें सामने आने पर आम आदमी का भरोसा  डिगा है। हालांकि यह मुद्दा भी राजनीतिक दलों को अपने गिरेबां में झांकने तथा उन्हें और सतर्क करने के लिए पर्याप्त है। इसका वक्त भी सामने आ खड़ा है। आगामी दो सालों में कुछ राज्यों और दिल्ली की सरकार के भाग्य का फैसला होना है। इस संदर्भ में ये चुनाव कुछ नए अनुभव लिए होंगे। चुनावी खैरात बांटने और सुनहरे सपनों के उन वादों से राजनीतिक दलों को बचना होगा, जो मर्यादा और संहिता के दायरे से बाहर हैं। स्वतंत्रता दिवस पर लोक, व्यवस्था, सरकारों और समाज के सभी क्षेत्रों के नेतृत्वकर्ताओं को यह संकल्प लेना होगा कि आजाद भारत का सपना- कुछ एक क्षेत्रों का विकास नहीं, बल्कि समग्र विकास रहा है। इस समग्र विकास का पैमाना-भारत का आम आदमी रहे। भारत के विकास के इंद्रधनुष की वास्तविक सुंदरता इसी में रहेगी कि उसका हर रंग अपने रंग में और गहरा होता रहे…!

: प्रफुल्ल माहेश्वरी

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