श्री अन्ना हजारे ने लोकसभा की अनशन तोडऩे की अपील न मानते हुए तीन शर्तें लगा दीं कि इन्हें कल संसद में लाया जाए. सरकार इस पर सहमत हो गई है कि कल इन मुद्दों पर सदन में चर्चा होगी. अन्ना हजारे के उपवास पर वार्ताओं व बैठकों का लंबा दौर चलता रहा. इसमें सबसे बड़ी उलझन इस बात से हो गई कि अन्ना ने अपने आंदोलन में संविधान व संसद व राजनैतिक दलों की उपेक्षा कर दी. वे जिद्दी बनके इस बात पर अड़ गये कि जैसा उनका जन लोकपाल है वही सदन में पेश किया जाए और संसद उसे मानसून सत्र में ही पारित करे. उनके साथ आम आदमी तो जुड़ता चला गया. देशव्यापी स्तर पर उनको समर्थन मिला. किसी भी लोकतंत्र का यह अर्थ कदापि नहीं हो सकता कि एक वर्ग जैसा कहे वैसा ही किया जाए. न ही सरकार और संसद यह कर सकती है कि संवैधानिक व्यवस्थाओं की उपेक्षा कर दें. उस तरह कोई कानून बनाया ही नहीं जा सकता. श्री अन्ना हजारे का कदम अतिरंजित हो गया.

अनशन के नौवें दिन सरकार की ओर से बुलाई गई सर्वदलीय बैठक और दूसरे दिन 10वें दिन इस मामले में कुछ सार्थक वातावरण बना है. लोकसभा में प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष श्रीमती सुषमा स्वराज ने और उससे अपने को जोड़ते हुए लोकसभा अध्यक्ष श्रीमती मीरा कुमार ने अन्ना हजारे से अपील की है कि उनका जीवन बहुमूल्य है. उन्होंने राष्ट्र हित भ्रष्ट्राचार के मुद्दे पर प्रभाव जन आंदोलन उठाया है. उन्हें अपना अनशन त्याग देना चाहिए.

संसद की स्थाई सरकार द्वारा प्रस्तुत लोकपाल बिल, समिति को कांग्रेस सांसद श्री प्रवीण आरोन द्वारा प्रेषित अन्ना का जन लोकपाल बिल, श्रीमती अरुणा राय द्वारा प्रस्तुत लोकपाल बिल व अन्य सभी सुझावों पर विचार कर एक राष्ट्रीय सहमति के साथ प्रभावी लोकपाल विधेयक लाया जायेगा. इसी बीच दलितों के संगठन ने एक बहुजन लोकपाल बिल पेश करने की पहल की है. संसद की स्थाई समिति में इन सभी पर विचार हो जायेगा.

प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री जे.एस. वर्मा से पत्र लिखकर आग्रह किया है कि वे इस मामले में सरकार व अन्ना केम्प के बीच मध्यस्थ व समझौताकार की भूमिका निभाएं. ऐसा आभास होने लगा है कि श्री वर्मा इस मामले पर श्री अन्ना हजारे को राजी कर लेंगे कि संवैधानिक और संसदीय प्रक्रियाओं का पालन करते हुए लोकपाल पर सभी पक्षों के विचारों पर संसद की स्थाई समिति विचार कर राष्ट्रीय आम सहमति का लोकपाल विधेयक तैयार करेगी. लोकसभा के निर्णय और उसके द्वारा सर्वसम्मत से श्री अन्ना हजारे से अनशन त्यागने की अपील इस राजनैतिक द्वंद की सुखद परिणित करेगी.

संसद को इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि पिछले 40 सालों से उनके समक्ष लोकपाल विधेयक को झुलाया, लटकाया जा रहा है यह भी संसद की घोर अवमानना व तिरस्कार है. महिला आरक्षण विधेयक भी संसद में गत 14-15 सालों से झुलाया जा रहा है. देश का प्रबुद्ध और महिला वर्ग संसद के इस रवैये से बहुत ही क्षुब्ध है. अब लोकपाल के साथ-साथ महिला आरक्षण बिल पर भी निर्णय हो ही जाना चाहिए. लगातार टालते रहना भी संसद का नाकारापन साबित करता है. संसद को स्वयं भी अपनी गरिमा के प्रति सचेत रहना चाहिए. आशा की जाती है कि संसद आगामी सत्र में लोकपाल व महिला आरक्षण दोनों विधेयक पारित कर देगी.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
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