मातृ भाषा में शिक्षा और संचार विषय पर तीन दिवसीय कार्यशाला का प्रारंभ

भोपाल, 12 मई. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के कुलपती प्रो. कुठियाल का कहना है कि कोई भी जागृत समाज अपनें लिये श्रेष्ठ विकल्पों का ही चयन करता है. उसे यह तय करना चाहिये कि उसकी शिक्षा और संवाद की भाषा क्या हो.

वे पत्रकारिता विश्वविद्यालय राजीव गांधी प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा मातृभाषा में शिक्षा और संचार विषय पर आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला के शुभारंभ सत्र में बोल रहे थे. उन्होंने कहा कि 190 साल की अंग्रेजो की गुलामी ने हमारी सोच प्रक्रिया, भाषा, जीवन शैली, सब असर डाला पर आजादी के इन सालों में भी उक्त मानसिकता से मुक्त नहीं हो सके. जब हमारे पास संस्कृत सहित न जाने कितनी भारतीय भाषाओं और बोलियों का जीवंत संसार है तो हमने क्यों विदेशी भाषा की बेडिय़ां डाल रखी है? आज गूगल भारतीय भाषाओं में कार्य करनें लगा है. वह उसमें अवसर और सम्भावनाएं ढूढ़ रहा है किन्तू अफसोस कि हमारे लोग इसे नहीं समझते. उनका कहना था कि शिक्षा और संवाद भारतीय भाषाओं में होना चाहिये निर्णायक लड़ाई लडऩें और कार्य योजना बनाने की आवश्यकता है.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि गिरीश उपाध्याय ने कहा कि बच्चे के जन्म के समय जो भाषा उसके साथ होती है वही उसकी शिक्षा के लिये सबसे उपयोगी होती है्. जन्म और शिक्षा की भाषा अलग होने से सीखने की निरंतरता पर अघात पहुंचता है. कई बच्चे इसे सही नहीं पाते और वे एक भाषा के नाते जीवन की दौड़ में पीछे रह जाते है. संचार की भाषा में स्थानीय संस्कार ही उसे प्रवाह मान और समृद्घ बनाते है. भाषा एक स्टाप डेम की तरह न हो वह पुण्य सलिला की तरह प्रभावित होनी चाहिये. हिन्दी में अंगे्रजी की अतिवादी घुसपैैठ ठीक नहीं है, किन्तु सहजता से कुछ आ रहा है तो स्वीकारना चाहिये. हिन्दी और भारतीय भाषाओं में इतनी शक्ति है कि वे सबको साथ लेकर चल सकती है.

आरंभ मेंं विषय प्रवर्तन करते हुए शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के सचिव अतुल कोठारी ने कहा कि देश में न्यास द्वारा आयोजित यह पहली कार्यशाला है. जिसमें 10 राज्यों से आये लगभग 70 प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे है. इसके किये गये संकल्पों को लागू किया जायेगा. उनका कहना था कि यह योजनापूर्वक यह भ्रम फैलाया गया है कि अंगे्रजी के बिना किसी व्यक्ति और राष्ट्र की प्रगति नहीं हो सकती. उन्होंने सवाल किया कि जापान, चीन, जर्मन, इजरायल, ने प्रगति क्या अंगे्रजी के बल पर की है. उन्होंने कहा कि हमेंं भ्रम के बादल हटानें होंगे और हवा का रूख मोडऩे का काम करना होगा. यह का भारतीय भाषाओं की एकता से ही हो सकता है.

आज के आयोजन

कार्यशाला के दूसरे दिन 12 मई को प्रात: 9.30 बजे राष्ट्रीय एकता और अखंडता में हिन्दी व हिन्दी भाषाओं का योगदान विषय पर चर्चा होगी. दूसरा सत्र 11 बजे प्रारंभ होगा. जिसमें सरकारी कामकाज में हिन्दी और हिन्दी भाषाऐं, तीसरे सत्र दिन में 2 बजे से प्रतियोगी परीक्षाओं को माध्यम हिन्दी एवं भारतीय भाषाएं, चौथे सत्र में दिन में 3.45 बजे से उच्च एवं व्यवसायिक शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएं, पांचवें सत्र में पत्रकारित एवं भारतीय भाषाएं सायं 4.30 बजे से विषय पर चर्चा होगी. इस सत्रों में जगदीश उपासनें प्रो. पीयूष त्रिवेदी, डॉ. विजय अग्रवाल, डॉ. जगदीश कर्नावट, नाहर सिंह वर्मा, जगदीश नारायण, डॉ. मनोहार भंडारी, रमेश शर्मा अपने विचार व्यक्त करेंगे.

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