यूरोपीय संघ के यूरो ऋण संकट का मुख्य कारण भारतीय मनीषी मुनि चार्वाक के सिद्धांत का अनुसरण हो गया कि ”ऋण लो और घी पियो.” जिसका अर्थ यही निकाला गया कि कर्ज लो और मौज करो. यूरोप के ग्रीस, आयरलैंड, पुर्तगाल, स्पेन व इटली की सरकारों ने कुछ ऐसा ही कर डाला कि ऋण लेते गये और घरेलू आय के स्रोत और कर्जों को चुकाने की क्षमता की ओर ध्यान दिया नहीं. ग्रीस आर्थिक व ऋण संकट पर भारतीय वित्त मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने यही कहा था कि लगातार घाटे का बजट प्रस्तुत करना भी आत्मघाती हो जाता है.

ग्रीस जिसे यूनान कहा जाता है सिकन्दर का देश है. मध्ययुगीय इतिहास में यह यूरोप की श्रेष्ठ सांस्कृति के रूप में स्थापित था. इसके बाद ही रोमन सभ्यता का नाम आता था. आज यह देश यूरो का दिवालिया देश बना हुआ है. यूरोप के अन्य देश उसे दूसरे देशों व अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं आई.एम.एफ. व विश्व बैंकों का कर्जा उतारने में आर्थिक मदद दे रहे हैं. बैंकों द्वारा उसके ब्याज में छूट दी जा रही है. भारत के प्रधानमंत्री ने भी जी-20 सम्मेलन, आसियान व एशिया संघ के बैठकों में कहा कि भारत भी यूरोप को ऋण संकट से मदद करेगा. यूरोपीय ऋण संकट अब विश्व बैंक संकट के रूप में परिवर्तित हो रहा है. अमेरिका के बैंक मंदी के पहले दौर के बाद से फिर दुबारा संकट में आ गये हैं. अमेरिका बैकिंग जाइन्ट ”सिटी ग्रुप” में 2 लाख 67 हजार कर्मचारी काम करते हैं. इनमें से 17 प्रतिशत स्टाक की कमी की जा रही है. इस बैंक के प्रमुख कार्यकारी (चीफ एक्जीक्यूटिव) भारतीय मूल के श्री विक्रम पंडित है. इनके अनुसार इस समय वैश्विक व्यवस्था में अस्थिर बाजार और विकसित देशों में कमजोर होती जा रही अर्थव्यवस्था से बैंक जैसी वित्तीय सेवाएं गहरे दबाव में है. आने वाले समय में इनमें प्रतिस्पर्धा भी प्रभावित हो जायेगी.

भारत के वित्त मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी भारतीय बैंकों के मामले में चाक-चौकस हो गये हैं. वैश्वयीकरण और विदेशी व निजी क्षेत्र के बैंकों से गहन प्रतिस्पर्धा के मुकाबले भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के शासकीय उपक्रम राष्ट्रीयकृत बैंकों के लिये सन् 2030 तक का ”ब्लू प्रिंट” तैयार किया है. केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाई है जो इन बैंकों की पूंजी की जरूरत, पूंजी तक पहुंच, उनके नेटवर्क, व्यापार और मानव संसाधन को इतना सुदृढ़ रखना चाहती है, जो बैंकिंग क्षेत्र में कड़ी प्रतिस्पर्धा कर सकें. अगले 10 सालों में भारत सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों व वित्तीय संस्थानों में 4,50,000 करोड़ रुपयों की पूंजी देगी जिससे उनका पूंजी आधार (केपीटल बेस) सुदृढ़ बना रहे. इसी वित्त वर्ष में जो मार्च 2012 तक सरकार भारतीय स्टेट बैंक सहित अन्य सार्वजनिक बैंकों को 20,000 करोड़ रुपयों की पूंजी दे देगी. रेग्यूलेटरी प्रावधानों के अंतर्गत बैंकों को केपीटल का न्यूनतम 8 प्रतिशत पूंजी बनाये रखना पड़ती है. मंदी के दौर में बैंकों का बकाया बढ़ता जाता है. वित्त मंत्रालय राजकोषीय घाटा रोकने के लिये नये रास्ते तलाश कर रहा है. इसके तहत सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों में विनिवेश करके 1.1 लाख करोड़ रुपये जुटाये जा रहे है. इस समय केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा विभिन्न कारणों से अनुमानित स्तर से आगे चला गया है.

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