दिल्ली के जंतर-मंतर का निर्माण सवाई जय सिंह द्वितीय ने कराया था. ग्रहों की गति नापने के लिए यहां कई तरह के उपकरण लगवाए गए हैं. सम्राट यंत्र, सूर्य की मदद से वक्त और ग्रहों की स्थिति बताता है

जैसा कि नाम से ही पता चलता है, जंतर-मंतर एक ऐसी जगह है, जहां जाने पर तुम पहले सोच में पड़ जाओगे कि कहां आ गए. दिल्ली का जंतर-मंतर खगोलीय उपकरणों का एक संग्रह है, जो समय को मापने, विभिन्न ग्रहों की स्थिति पर नजर रखने, मौसम की भविष्यवाणी और खगोलीय हलचलों का पता लगाने के लिए बनवाया गया था. इसका निर्माण महाराज जय सिंह ने 1727 से 1734 के बीच करवाया था. भारत में दो जंतर-मंतर हैं, एक जयपुर में है, जो विश्व विरासत सूची में शामिल है और दूसरा दिल्ली में है.

इसका निर्माण सवाई जय सिंह द्वितीय ने कराया था. ग्रहों की गति नापने के लिए यहां कई तरह के उपकरण लगवाए गए हैं. सम्राट यंत्र, सूर्य की मदद से वक्त और ग्रहों की स्थिति बताता है. मिस्र यंत्र, साल के सबसे छोटे और सबसे बड़े दिन को नापता है. इसके अलावा यहां नाड़ी वलय यंत्र, दिगंश यंत्र, भित्ति यंत्र आदि प्रमुख हैं. जंतर-मंतर को बनाने में 6 साल लगे थे और यह 1734 में बनकर तैयार हुआ था.इन दोनों में ही सभी उपकरणों को पत्थर और संगमरमर से बनाया गया है. जंतर-मंतर का सबसे बड़ा साधन 90 फीट ऊंचा है. इस खम्भे की छाया इस तरीके से प्लॉट की गई है कि दिन का सही समय इसी से पता चलता है.

इसे सम्राट जंतर कहते हैं. एक ध्रुव यंत्र, जो हमारे सौरमंडल के ग्रहों की स्थिति के अनुसार रेखांकित किया गया है. इस तरह जंतर-मंतर में ऐसे कई यंत्र हैं, जो खगोल विज्ञान को पूर्ण रूप से दर्शाते हैं.जंतर-मंतर बुद्धिमान कलाकृति का नमूना है. इसे बिना किसी मशीन की मदद से बनाया गया. इन उपकरणों की अच्छा बात यह है कि यह सौ प्रतिशत सही हैं.

यह हमेशा दुनिभा भर के आर्किटेक्ट, इतिहासकर और वैज्ञानिकों को आकर्षित करता आया है. दिल्ली का जंतर-मंतर संसद मार्ग पर है. इसका रख-रखाव राजस्थान सरकार द्वारा किया जाता है. तो मत करो देरी और पहुंच जाओ जंतर-मंतर.

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