पावस व्याख्यानमाला में जुटे चार पीढिय़ों के व्यंग्यकार

भोपाल, 20 अगस्त. हिन्दी भवन में शनिवार को प्रारंभ हुई दो दिवसीय 19वीं पावस व्याख्यान माला कल हिन्दी व्यंग्य का वर्तमान रूप और संभावनाएं विषय पर विचारोत्तेजक विमर्श के साथ संपन्न हुई. इस विमर्श में हिन्दी व्यंग्य की चार पीढिय़ों के व्यंग्यकारों डा. नरेन्द्र कोहली डा. ज्ञान चतुर्वेदी प्रो. मूलाराम जोशी प्रेम जन्मेजय श्रीमती सूर्यवाला, श्रीकांत आपटे और शांतिलाल जैन ने वैचारिक भागीदारी की.

म.प्र. राष्टï्रभाषा प्रचार समिति और हिन्दी भवन न्यास के इस संयुक्त आयोजन में प्रमुख वक्ता के रूप में बोलते हुए उपन्यासकार एवं व्यंग्यकार डा. नरेन्द्र कोहली ने कहा कि व्यंग्य लेखन के लिए यह समय सबसे अधिक अनुकूल है. देश में आज जितनी अधिक समस्याएं है.
उतनी पहले कभी नहीं थी. व्यंग्य के छपने की संभावनाएं भी अब काफी बढ़ गई है. व्यंग्य को अधिक से अधिक पाठको तक पहुँचाना आज की सबसे बड़ी चुनौती है. आपने आग्रह किया कि स्थापित व्यंग्यकार नये लेखकों को निराश करने की बजाय उनको प्रोत्साहित कर अच्छा लिखने के लिए अवसर दें.

मासिक व्यंग्य यात्रा के संपादक प्रेम जन्मेजय की अध्यक्षता में हुए इस विमर्श में बोलते हुए डा. नरेन्द्र कोहली ने आगे कहा कि आजकल अखबार कम से कम शब्दों में लिखी गई व्यंग्य रचनाएं चाहते है. व्यंग्यकारो के सामने यह एक बड़ी चुनौती है. इसको स्वीकार करने के लिए उन्हें स्वयं को तैयार करना चाहिए आपने कहा कि आज कुछ ऐसे राष्टव्यापी ज्वलंत विषय है जिस पर लिखकर ही व्यंग्यकार स्वयं को सार्थक कर सकता है. व्यंग्यकारों को विभिन्न प्रकार के दबावों का सामना करते हुए अपने व्यंग्य धर्म का निष्ठï से पालन करना होगा. व्यंग्यकारों को समय की चुनौतियों से मुंह नहीं चुराना चाहिए. अमर व्यंग्य लेखन अपने समय की सच्चाईयों से पलायन कर गाया, तो वह बेमानी हो जाएगी. प्रेम जन्मेजय ने कहा कि व्यंग्य को कड़े सैद्घांतिक बंधनों में जकडऩे का प्रयास अनुचित है. व्यंग्य का एक खुद का स्वरूप और उसकी अपनी एक शास्त्रीयता है.

व्यंग्य लेखन को लेकर निराशा की कोई स्थिति नहीं है व्यंग्य में काफी लिखा जा रहा है और उसकी स्वीकार्यता भी बढ़ रही है. अब नये लेखक उसको नये-नये आयाम दे रहे है. आपने कहाकि साहित्यकार के जो सरोकार है, वे ही व्यंग्यकार के सरोकार भी है. कूड़ा कचरा तो साहत्य की हर विध में लिखा जा रहा है. केवल व्यंग्य को दोष देना उचित नहीं है. वैसे व्यंग्यकारो को स्वयं की आलोचना के लिए भी तैयार रहना चाहिए. अब व्यंग्य लेखन के लिए विषयों की कोई सीमा नहीं रह गई है. रोज नये विषय सामने आ रहे है. आपने कहा कि अब व्यंग्य के प्रति दृष्टिïकोण बदलना चाहिए. यह अब साहित्य की सीमित विधा नहीं रह गई है.

व्यंगकार श्रीमती सूर्यबाला ने कहा कि व्यंग्य की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है. व्यंग्य ने साहित्य की अन्य विधाओं को ओवरटेक कर दिया है. व्यंग्य की पुस्तके धड़ाधड़ा छप रही है. समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में भी व्यंग्य खूब छप रहा है. व्यंग्यकारों की एक फौज अब देश में खड़ी हो चुकी है. उन्होंने कहा कि कुछ ऐसे बड़े लेखक हैं जो खातो व्यंग्य की रहे है, लेकिन वे गुणगान अन्य विधाओं का करते है. यह मनोवृत्ति थमना चाहिए क्योंकि इसे व्यंग्य को नुकसान हो रहा है मांग के चक्कर में व्यंकगरो को अपने लेखन की गुणवत्ता की गिरावट से बचना होगा. वरिष्ठ व्यंग्य लेखकों ने जो मानक स्थापित किया है उन तक आज के आम व्यंग्यकार नहीं पहुँचे है. यह चिंता की बात है. सख्त मानदंडों के आधार पर क्रिएटिव रचना समय नहीं है. आलोचना भी रचना के आधार पर ही होनी चाहिए.

वरिष्ठï व्यंग्यकार डा. ज्ञान चतुर्वेदी ने कहाकि व्यंग्य के लिए यह अच्छा समय है. आज जितनी पीढिय़ां व्यंग्य लेखन में पहले कभी सक्रिय नहीं थी. नये लेखकों को स्तरीय और धारदार लेखन के लिए पहले व्यंग्य से दीक्षित होना चाहिए. तब ही वे ठीक से व्यंग्य लिख सकेंगे. नये लेखक छपने के लालच में रचना की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दे रहे है. आपने कहा कि पूर्वज व्यंग्यकारो की उपलब्धियों का ढोल पीढऩे से अब काम नहीं चलेगा. आज की व्यंग्यकारों को खुद कुछ खास करके दिखाना होगा. हरिशंकर परसाई के समय इतनी चुनौतियों नहीं थी. जितनी आज है. आज परदे के पीछे और सामने दोनों जगह नाटक चल रहा है. परदा हट चुका है इस स्थिति को सामने रखे बिना व्यंग्य नहीं लिखा जा सकता. यदि आज के व्यंग्यकार केवल वाह-वाह के फेर में ही पड़े रहे तो एक दिन व्यंग्य समाप्त हो जाएगा. व्यंग के मानदंड तो व्यंग्यकार के व्यक्तित्व का हिस्सा हो जाना चाहिए.

व्यंगकार प्रो. मूलाराम जोशी ने व्यंग्य लेखन के शस्त्रीय पक्ष का विस्तार से विवेचन करते हुए कहा कि व्यंग्य के मानदंड तैयार होना चाहिए और उसका आलोचना शास्त्र भी बनना चाहिये. जिससे कि व्यंग्य को सही दिशा मिल सके. आपने कहा है कि सरकार और समाज जैसे-जैसे अधोगति की ओर जाएगा, वैसे-वैसे व्यंग्य की संभावनाएं बढ़ेगी. आज के व्यंग्य के गहराई और व्यापकता कम देखने का मिल रही है. श्रीकांत आपटे का कहना था कि मांग की पूर्ति के लिए थोक में बड़े पैमाने पर व्यंग्य लेखन आज एक मुसीबत बन चुकी है. आजकल व्यंग्य के नाम पर हल्का फुल्का हास्य लेखन हो रहा है. व्यंग का मुख्य लक्ष्य तो बेहतर मानव समाज की रचना और विसंगतियों तथा विडम्बनाओ से टकराना है. अमर व्यंग्य यह नहीं कर रहा है तो वह निरर्थक है. वरिष्ठï लेखकों का मार्गदर्शन नयों को मिलेगा तो स्थितियां अवश्य सुधरेगी. नवोदित व्यंग्यकार शांतिलाल जैन ने हिन्दी व्यंग्य की यात्रा के पड़ावों को रेखांकित करते हुए कहाकि इन दिनो देश में करीब 250 लेखक व्यंग्य लिख  रहे है लेकिन स्तरीय लेखक का अभाव बना हुआ है. आज के लेखक तथ्यों की पड़ताल किये बिना लिख रहे है और विविधता का अभाव भी है. सत्र का संचालन वरिष्ठ कथाकार मुकेश वर्मा ने किया.

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