केंद्रीय मंत्री मंडल ने कांग्रेस अध्यक्ष व यू.पी.ए.की सभापति श्रीमती सोनिया गांधी के ”ड्रीम प्रोजेक्ट” खाद्य सुरक्षा विधेयक को मंजूरी दे दी और यह इसी सप्ताह संसद में प्रस्तुत हो जायेगा. इस विधेयक व लोकपाल विधेयक के लिए संसद का सत्र भी 27 दिसम्बर से आगे बढ़ाया जा रहा है. लोकपाल विधेयक 20 दिसम्बर को प्रस्तुत होना संभावित है. इस पर 19 दिसम्बर को केबिनेट की मंजूरी हो जायेगी.

खाद्य सुरक्षा के तहत देश की एक अरब दो करोड़ आबादी में से 80 करोड़ लोगों को इसका लाभ पहुंचेगा जो कुल आबादी का 65 प्रतिशत भाग है. अभी सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर सरकार लगभग 63 करोड़ रुपया सबसिडी देती है जो खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत बढ़कर 1 लाख 15 करोड़ रुपये हो जायेगी. इस समय देश में 25 करोड़ मीट्रिक टन खाद्यान्न का उत्पादन होता है और इसमें से लगभग साढ़े छह करोड़ मीट्रिक टन अनाज सरकार समर्थन मूल्य पर उपार्जित करती है. इस नये कानून के परिपालन में उसे 610 लाख मीट्रिक टन खरीदना होगा. इसके तहत शहरों की 50 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों की 75 प्रतिशत आबादी को 3 रुपये किलो चावल, 2 रुपये किलो गेहूं और एक रुपया किलो मोटा अनाज मिलेगा, जो गरीबी रेखा के नीचे हैं उन्हें प्रतिमाह 7 किलो अनाज प्रति व्यक्ति के हिसाब से दिया जायेगा. जो गरीबी रेखा से ऊपर वाला वर्ग है उसे 3 किलो प्रति व्यक्ति प्रतिमाह समर्थन मूल्य खरीदी के भाव से आधे दामों पर दिया जायेगा. किसी कारण खाद्यान्न उपलब्ध न होने पर राज्यों व व्यक्तियों को नकदी भुगतान किया जायेगा.  इस विधेयक पर एक लंबे अरसे से कहा जा रहा था जो अब मंजूर हुआ है, इसलिए इसे चुनावों के मद्दे नजर लाया कहा जा रहा है. यदि ऐसा है भी तो इससे खाद्य सुरक्षा की मंशा कम नहीं होती है. वर्तमान व्यवस्था में तो हर वक्त कहीं न कहीं चुनाव होते ही रहते हैं. उनके लिए यदि ठहरा जाए तो कभी कोई ऐसा बड़ा काम हो ही नहीं सकता.

इसमें सबसे बड़ी आशंका यह हो रही है कि मंशा तो बहुत अच्छी है लेकिन उसको पूरी तरह लागू करना अगर असंभव नहीं तो बहुत मुश्किल जरूर होगा. क्योंकि अभी तक इस मामले में चली आ रही सार्वजनिक वितरण प्रणाली में रिश्वतखोर अफसर, छुटभैये नेताओं द्वारा राशन दुकानें हथिया लेना, राशन का नीला घासलेट तेल होटलों  बसों व ट्रकों के संचालकों को ब्लेक में बेचना, राशन का अनाज व शक्कर का गांवों तक नहीं पहुंचना, राशन दुकानों को मालिक नेताओं द्वारा उसे बाजार में बेच देना आदि ही चलता है. सर्वोच्च न्यायालय ने तो यहां तक टिप्पणी कर चुकी है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली की पूरी व्यवस्था ही भ्रष्टाचार है और इस काम को खत्म कर देना चाहिए. विधेयक में सार्वजनिक व्यवस्था में कुछ सुधार किये गये. गरीबी रेखा के नीचे के वर्ग का निर्धारण तय नहीं हो पा रहा है. जांच-पड़ताल में जितने घटते हैं उससे कहीं ज्यादा बढ़ जाते हैं. इस खाद्य सुरक्षा कानून की सफलता इसमें ही निहित है कि इसकी वितरण व्यवस्था कैसे ठीक-ठाक और भ्रष्टाचार से मुक्त रखी जा सकती है.

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